चुनाव आयोग ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कानून के तहत ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है जो राजनीतिक पार्टियों को धार्मिक अर्थों के साथ दल के रूप में पंजीकृत करने से रोकता हो।
दरअसल, राजनीतिक दलों को आवंटित किए गए धार्मिक प्रतीक या नाम को रद्द करने के लिए निर्देश देने की मांग करते हुए कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि कुछ राजनीतिक दलों के पंजीकृत नामों के धार्मिक अर्थ हैं जो विरासत बन गए हैं, क्योंकि वे दशकों से अस्तित्व में हैं।
आयोग ने कहा, फिर भी राजनीतिक दलों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों के अनुसार धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का पालन करना जरूरी है। याचिका सैयद वसीम रिजवी उर्फ जितेंद्र त्यागी की ओर से दायर की गई है।
याचिका में चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की गई है कि उन राजनीतिक दलों को आवंटित प्रतीक या नाम को रद्द किया जाए जो किसी भी तरह से किसी भी धर्म का प्रतीक हैं, क्योंकि इस तरह की प्रथा संविधान के सामाजिक ताने-बाने का उल्लंघन करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा धार्मिक नामों और प्रतीकों के दुरुपयोग का आरोप लगाने वाली याचिका पर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) से अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।
न्यायमूर्ति एम. आर. शाह और न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश की पीठ ने आईयूएमएल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कहा कि उन्हें याचिका पर जवाब दाखिल करना चाहिए। दवे ने कहा, याचिकाकर्ता एक अभद्र भाषा के मामले में जमानत पर है। उसने चुनिंदा रूप से आईयूएमएल को निशाना बनाया है और शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल जैसे दलों को छोड़ दिया है, जिनके नाम में कहीं अधिक धार्मिक अर्थ हैं।
रिजवी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने काह कि आईयूएमएल केरल में एक पंजीकृत राजनीतिक दल है और विधानसभा में इसके विधायक हैं। याचिकाकर्ता ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) को भी पक्ष बनाया है।