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बिहार की राजनीति में नया मोड़ देने की तैयारी, नीतीश- पासवान और कुशवाहा की तिकड़ी होगी कामयाब?

Mon, 09 Apr 2018 02:14 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दिल्ली
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जैसे जैसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान की नजदीकियां बढ़ रही है वैसे वैसे बिहार की राजनीतिक दिलचस्प हो रही है। पिछले दिनों नीतीश कुमार जहां विशेष राज्य के दर्जे को लेकर केंद्र को आड़े हाथों लिया और बिहार में बढ़ रहे सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ मुखर रहे हैं। उनका यह बदला रूप बिहार की राजनीति में कई इशारे कर रहा है। जबकि लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान मुसलमानों से बीजेपी की दूरी का जिक्र भी कर चुके हैं। बिहार में बिगड़ते माहौल पर नीतीश कुमार कह चुके हैं कि वह सांप्रदायिक ताकतों से समझौता नहीं करेंगे।
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वहीं बिहार की राजनीति का नया रूप अंबेडकर दिवस पर 14 अप्रैल को हो रहे एक कार्यक्रम में  देखने को मिल सकता है। इस कार्यक्रम में नीतीश, रामविलास पासवान और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता उपेंद्र कुशवाहा के एक मंच पर दिखने की संभावना जताई जा रही है।

 राम विलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा एनडीए सरकार में मंत्री हैं। लेकिन नीतीश और रामविलास पासवान की निकटता 2019 के आम चुनाव में बीजेपी पर दबाव बनाने की तैयारी के रूप में भी देखी जा रही है। पिछले छह महीने में दोनों चार बार से अधिक मिल चुके हैं। वहीं 14 अप्रैल को हो रहे बिहार दलित सेना के राष्ट्रीय अधिवेशन में दोनों के एक साथ शामिल होने और उसमें उपेंद्र कुशवाहा के आने खबर के साथ यह तय माना जाने लगा है कि तीनों की तिकड़ी कुछ कमाल कर सकती है।
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महागठबंधन ने अलग हो जाने के बाद यह बात भी साफ हो गई है कि नीतीश कुमार बिहार में अपने दम पर सरकार नहीं चला सकते हैं। उनको बैशाखी की जरूरत फिर पड़ेगी। ऐसे में राजनीतिक जानकार अटकलें लगा रहे हैं कि क्या नीतीश कुमार किसी तीसरे विकल्प की तलाश कर रहे हैं। 


 
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नीतीश कुमार राज्य में कुर्मी और कोयरी जातियों के प्रतिनिधि माने जाते हैं

नीतीश,पासवान और कुशवाहा के साथ मिल जाने से जो समीकरण बन रहा है उस हिसाब से गैर-यादव ओबीसी और महादलितों को मिलाकर 38 प्रतिशत का वोटबैंक बनता है।  नीतीश,पासवान और कुशवाहा का नया गठबंधन और नई तिकड़ी  क्या कमाल करेगी इसपर अभी से कई सवाल उठने लगे हैं।   

नीतीश कुमार को राज्य में कुर्मी और कोयरी जातियों के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता है। उपेंद्र कुशवाहा कोयरी वोटबैंक पर पहले ही सेंध लगा चुके हैं। लेकिन अगर कुशवाहा भी नीतीश के साथ आते हैं तो वह और मजबूत होंगे। 

वैसे इन तीनों में भी दरार कम नहीं रही है। जब नीतीश कुमार ने  पिछले चुनाव में दलितों पर मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए दलितों  में महादलित की घोषणा की थी तो राम विलास पासवान ने इसका विरोध किया था।  

महादलित आयोग की सिफारिशों पर, 22 दलित जातियों में से 18 (धोबी, मुसहर, नट, डोम और अन्य) को महादलित का दर्जा दे दिया गया था। दलितों की कुल आबादी में इनकी संख्या 31 फीसदी के लगभग है। इतना ही नहीं चमार, पासी और धोबी को भी इसमें शामिल कर दिया था। अब सिर्फ पासवान (दुसाध) ही महादलित से बाहर हैं जिन्हें राम विलास पासवान का वोटबैंक कहा जाता है। माना ये जा रहा है कि मुख्यमंत्री दलितों के राष्ट्रीय अधिवेशन में पासवान को महादलित की श्रेणी में शामिल करने की घोषणा कर सकते हैं। आपको बता दें कि नीतीश ने जब महादलित श्रेणी बनाई थी तब उन्होंने इसमें पासवान को शामिल नहीं किया था।


वहीं राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उपेंद्र कुशवाहा को आरजेडी में शामिल होने के लिए खुला निमंत्रण मिला है। कुशवाहा दिल्ली के एम्स अस्पताल में पिछले दिनों लालू यादव से भी मिलने पहुंचे थे । इसके अलावा बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने पासवान का किसी और गठबंधन या पार्टी में शामिल होने की खबरों को सिरे से नकार दिया है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि 14 को हो रहे दलित अधिवेशन का निमंत्रण तो डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी को भी मिला है और वह भी उस अधिवेशन में शामिल होंगे।
इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वह कोई अलग फ्रंट बनाएंगे।उन्होंने आगे कहा कि सुशील मोदी जैसे लोग बीजेपी के लिए जी भी सकते हैं और मर भी सकते हैं। वहीं आरजेडी भी दावा कर रही है कि पासवान जल्द ही महागठबंधन में शामिल हो सकते हैं। आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि पासवान और आरजेडी के बीच बातचीत चल रही है। पासवान एनडीए में रहकर घुटन महसूस कर रहे हैं।
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