राजद के अस्तित्वहीन होने की संभावना के बीच नीतीश ने इस दल के समर्थक अल्पसंख्यक वर्ग के साथ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का साधना शुरू किया। अगड़ों को साधने की अलग रणनीति बनाई। जदयू में नीतीश के करीबियों की माने तो उनके पास अति पिछड़ा और मुसलमान को साथ ले कर अलग राजनीति करने का विकल्प है।
गौरतलब है कि राज्य में मुसलमान मतदाता करीब 17 फीसदी हैं जो राजद के कमजोर होने के बाद असमंजस की स्थिति में हैं। ऐसी स्थिति में अगर भाजपा-जदयू अगले साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में साथ रहे भी तो यह नतीश की शर्तों पर होगा। हालांकि भाजपा भी राजद के यादव वोट बैंक पर निगाह जमाए बैठी है।
लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष में नेतृत्वहीनता की स्थिति है। अगर नीतीश अपने दम पर विधानसभा चुनाव जीते तो वह निर्विवाद रूप से विपक्षी दलों की धुरी बना जाएंगे। जिस प्रकार नीतीश के करीबी और जदयू के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर भाजपा की धुर विरोधी ममता बनर्जी की सलाहकार की भूमिका निभाने के साथ आंधप्रदेश में जगन मोहन रेड्डी सहित कई विपक्षी नेताओं के संपर्क में हैं, उससे इस रणनीति को बल मिल रहा है।