करीब छह दिन पहले भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और मुख्यालय प्रभारी अरुण सिंह की दस्तखत से दो पत्र थोड़े से अंतराल पर जारी हुए। पहले पत्र में पार्टी की शीर्ष ईकाई केंद्रीय संसदीय बोर्ड के नवगठन की जानकारी थी और दूसरे में केंद्रीय चुनाव समिति की। दोनों में से भाजपा के पूर्व अध्यक्ष, केंद्र के दो शीर्ष मंत्रियों में शुमार नितिन गडकरी का नाम नदारद था। नितिन गडकरी के साथ-साथ के सबसे पुराने और सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले शिवराज सिंह चौहान का भी पत्ता काट दिया गया था। इसको लेकर जितनी चर्चा दिल्ली के लुटियन जोन में चल रही है, उससे कहीं ज्यादा नागपुर में भी है। एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से संघ और भाजपा में अब प्रधानमंत्री मोदी का कद बड़ा हो रहा है?
केंद्रीय मामले में भाजपा का कोई भी निर्णय उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का माना जाता है, लेकिन सत्ता के गलियारे में सभी को पता है कि कोई भी पत्ता बिना प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अनुमति के बिना नहीं हिलता। कुछ समय पहले ही नितिन गडकरी ने पहले और आज की राजनीति की तुलना करते हुए इससे संन्यास लेने की इच्छा व्यक्त कर दी थी। 17 अगस्त को जब भाजपा ने करीब दोपहर 1.50 बजे यह दोनों पत्र जारी किया, तो इसे देखकर भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता ने प्रतिक्रिया दी कि चलिए गडकरी जी, लोग अब आपकी इच्छा पूरी करना चाहते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के दुलारे हैं। नागपुर से आते हैं और सांसद होने के साथ स्पष्टवादी भी हैं। राज्य सरकार से लेकर पार्टी के संगठन में और फिर केंद्र सरकार को लगातार अपने कामकाज का लोहा मनवा रहे हैं। राजनीति के गलियारे में यह भी लोगों को पता है कि मोदी सरकार-1 के कार्यकाल में गडकरी काफी मुखर थे। उनके आवास पर एक रात्रि भोज हुआ था। उसमें मोहन भागवत भी थे और प्रधानमंत्री भी। पूरे पांच साल गडकरी ने बिना कोई परवाह किए निष्कंटक तरीके से अपना मंत्रालय चलाया। लेकिन दूसरे कार्यकाल में वह काफी शांति से चलते रहे।
प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को छोड़ दें तो भाजपा और इसके सहयोगी दलों तथा विपक्ष में परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की दमदार छवि है। बिगाड़कर चलने में कम भरोसा रखते हैं। पक्ष या विपक्ष का सांसद, नेता उनके पास जाए तो कुछ लेकर ही लौटता है। गडकरी की एक पहचान और है। वह महाराष्ट्र के नेताओ में शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज चव्हाण, नाना पटोले, राज ठाकरे के बीच में अच्छे संबंध के लिए जाने जाते हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, कांग्रेस के तमाम नेताओं और भाजपा के सहयोगी दलों में भी अच्छी पैठ रखते हैं। भाजपा के भीतर कार्यकर्ता से लेकर पार्टी के नेता तक नितिन गडकरी की न केवल अपनी अलग पहचान है, बल्कि लोगों से निजी रिश्ते की वेवलेंथ भी अलग है। यही स्थिति संघ में भी है। यह भी सही है कि नागपुर के नितिन गडकरी और नागपुर के ही महाराष्ट्र के युवा उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस। फडणवीस संघ के चहेते, प्रधानमंत्री के दुलारे हैं। गडकरी और फडणवीस अब राजनिति में बुरी तरह प्रतिद्वंदी हैं।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भाजपा की वरिष्ठ नेता उमा भारती ने अपना विकल्प बताकर मुख्यमंत्री बनाया था। एक आपसी सहमति थी कि उमा भारती जांच से बेदाग होने के बाद फिर राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगी। लेकिन उमा भारती को इसके बाद कभी यह अवसर नहीं मिला। शिवराज सिंह चौहान बारीक राजनीति के लिए जाने जाते हैं। इसी कौशल के बल पर वह भाजपा के शीर्ष संस्थापक नेताओं के चहेते बने रहे। राज्य के लोगों के 'मामा' मुख्यमंत्री बनकर 2018 तक निष्कंटक राज किया। 2020 में ऑपरेशन लोटस के जरिए फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने। पिछले कुछ समय से भोपाल के राजभवन से दिल्ली के गलियारे तक चर्चा है कि भाजपा मुख्यालय उनके स्थान पर नए चेहरे को अवसर देना चाहता है। इसके पीछे मंशा सरकार विरोधी लहर से बचाकर उत्तराखंड जैसा प्रयोग करते हुए 2023 में प्रस्तावित चुनाव में सत्ता में बने रहना भी है। शिवराज पिछले महीनों में दिल्ली आए थे तो उन्हें कुछ संदेश मिले। कुछ नेताओं से मिल पाए और कुछ के समय नहीं मिल पाए। लुटियन जोन में यह भी चर्चा है कि केंद्रीय चुनाव समिति और संसदीय बोर्ड में बदलाव का उन्हें इस तरह संदेश देना भी माना जा सकता है। भाजपा के नेता इस तरह की संभावना से इनकार नहीं कर रहे हैं। उज्जैन के एक भाजपा नेता इसके लिए बीएस येदियुरप्पा का उदाहरण देते हैं। वह कहते हैं कि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री को उनके पद से हटाने से पहले केंद्रीय मुख्यालय ने पहले कई स्तरों पर संदेश दिया था। फिर अपनी इच्छा व्यक्त की और मुख्यमंत्री बसावराज बोम्मई का नाम तय होने और येदियुरप्पा के इस्तीफा देने में कई महीने लगे थे।
यह भी एक गजब का त्रियुग्म है। जब गुजरात से दर-बदर होकर अमित शाह दिल्ली प्रवास पर थे, तब नितिन गडकरी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। राजनीति की कड़वाहट को पकड़ने वाले नेता बताते हैं कि तब तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष ने शाह के साथ बहुत अच्छा बर्ताव नहीं किया था। वैसे भी नितिन गडकरी के बारे में आम है कि वह खुद को शीर्ष नेता के स्तर के बराबर समझते रहे हैं। इसलिए गडकरी और अमित शाह के बीच में सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी नजदीकियां कम देखी गईं। दूसरी बात देवेंद्र फड़णवीस की। नितिन गडकरी जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने की सोच रहे थे तो यह पद फडणवीस को मिल गया था। ऑपरेशन लोटस के बाद इसी साल जब जुलाई में महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा देवेंद्र फडणवीस के भीतर स्थान बना चुकी थी, तो अमित शाह के एक फैसले से इस पर पानी फिर गया था। महाराष्ट्र में फडणवीस के खेमे के भाजपाई इस अवसर के जाने का दोष अमित शाह पर मढ़ रहे थे। देवेंद्र फडणवीस के विरोधी भाजपाइयों ने कुछ ऐसे पोस्टरों के बारे में जानकारी दी, जिसमें अमित शाह का चेहरा ही नहीं था। उनका कहना था कि देवेंद्र फडणवीस के समर्थकों ने इस तरह से भड़ास निकाली है। भाजपा का एक तबका इसे इस तरह से भी समझा रहा है कि देवेंद्र फड़णवीस को पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति में लेकर बहुत कुछ संतुलित किया गया है। क्योंकि आगे महाराष्ट्र में राजनीति की बड़ी लड़ाई लड़नी है। बीएमसी का चुनाव भी और राज्य सरकार का भविष्य भी।
प्रयागराज के संघ के एक नेता का कहना है कि उत्तर प्रदेश भाजपा में बहुत कुछ संतुलित नहीं चल रहा है। संतुलन की कोशिश हो रही है। उत्तर प्रदेश सरकार के दूसरे या तीसरे नंबर पर आने वाले वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि देश प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्ण मार्गदर्शन में चल रहा है। इस लाइन का छिपा संदेश यह है कि तीन के बिना पत्ता बमुश्किल हिलता है। पिछले साल मई के महीने से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बदले जाने की चर्चा ने जोर पकड़ा था और कहा जाता है कि अपने दमखम और संघ की छाया पर मुख्यमंत्री पदासीन रह गए। जबकि उत्तराखंड में छह महीने के भीतर तीन चेहरे बदल गए। अब भाजपा के कई नेता दबी जुबान से कहने लगे हैं कि चुनावी राजनीति में प्रधानमंत्री मोदी की छवि के आगे कोई नहीं है। इसलिए संभव है कि वह राजनीतिक मामलों में किसी की दखल की गुंजाइश कम करना चाहते हों। नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान जैसे चेहरों की जगह युवाओं को अवसर देने के बहाने इसका भी संदेश हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के मार्गदर्शन में भाजपा ने बुलंदियों को छुआ है। संघ के भी नेता मानते हैं कि प्रधानमंत्री निरंतर संघ की विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। इसलिए न केवल देश में, बल्कि भाजपा और संघ में उनके अनुयाइयों की संख्या तेजी से बढ़ी है। अब वह एक बड़े कद्दावर और सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं।