नीति आयोग के सदस्य (कृषि) रमेश चंद ने कहा है कि आंदोलन कर रहे किसान नए कृषि कानूनों को पूरी तरह या सही प्रकार से समझ नहीं पाए हैं। उन्होंने कहा कि इन कानूनों में किसानों की आय बढ़ाने की काफी क्षमता है। इन कानूनों का मकसद वह नहीं है, जो आंदोलन कर रहे किसानों को समझ आ रहा है। इनका उद्देश्य इससे बिल्कुल उलट है।
चंद ने कहा, जहां तक मुझे लगता है किसानों ने इन कानूनों को सही तरीके से नहीं समझा है। अगर इन कानूनों का क्रियान्वयन होता है तो इसकी संभावना काफी अधिक है कि किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी। कुछ राज्यों में तो किसानों की आय दोगुना हो जाएगी।
दरअसल, किसानों का कहना है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम को हटा दिया गया है और स्टॉक करने व कालाबाजारी करने वालों को परी छूट दी गई है। इस पर चंद ने कहा, वास्तव में आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन किया गया है। इसके तहत प्रावधान किया गया है कि यह कानून कब लागू होगा। यदि अनाज, तिलहन या दालों के दाम 50 प्रतिशत बढ़ जाते हैं, तो इस कानून को लागू किया जाएगा।
इसी तरह अगर प्याज और टमाटर के 100 फीसदी बढ़ जाते हैं, तो यह कानून लागू होगा। चंद ने उदाहरण देते हुए कहा कि जब प्याज के दाम चढ़ रहे थे, तो केंद्र ने 23 अक्तूबर को यह कानून लागू किया था। उस समय यह जरूरी था।
कॉरपोरेट के लिए खेती और ठेके पर खेती में अंतर
किसानों की आशंकाओं को दूर करने का प्रयास करते हुए चंद ने कहा, कॉरपोरेट के लिए खेती और ठेके पर खेती में बड़ा अंतर है। देश के किसी राज्य में कॉरपोरेट खेती की अनुमति नहीं है। कई राज्यों में ठेका खेती पहले से हो रही है। एक भी उदाहरण नहीं है, जबकि किसान की जमीन निजी क्षेत्र की कंपनी ने ली हो।