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नीति आयोग बोला, जनांदोलन से खत्म हो सकता है सरकार में ‘हितों का टकराव’

Thu, 13 Sep 2018 12:31 PM IST
हरेन्द्र, नई दिल्ली
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rajiv kumar
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 नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का मानना है कि सरकार में ‘हितों के टकराव’ को खत्म करने के लिए कानून बनाने की बजाय जनांदोलन शुरू करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि एक वक्त था जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला के यहां ठहरते थे, तब राष्ट्रहित और जनहित सर्वोपरि था। लेकिन बदलते वक्त के साथ राष्ट्रहित और जनहित पीछे रह गया है। उन्होंने संविधान में ‘हितों के टकराव’ की परिभाषा को समझ कर संशोधन करने का सुझाव दिया।
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अधर में लटका नेशनल मेडिकल कमीशन बिल

मोदी सरकार के थिंक टैंक नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया यानी नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव का कहना है कि देश की जनहितकारी नीतियों में ‘हितों के टकराव’ बेहद आम है और देश में हर स्तर पर फैला हुआ है। उन्होंने नेशनल मेडिकल कमीशन बिल का उदाहरण देते हुए कहा कि पिछले संसद सत्र में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह इस बिल को पेश किया गया था, लेकिन टकराव के चलते यह बिल भविष्य के अधर में लटक गया है।

कई मेडिकल कालेजों के मालिक सांसद

‘हितों के टकराव’ को लेकर स्वदेशी जागरण मंच और ब्रेस्टफीडिंग प्रमोशन नेटवर्क ऑफ इंडिया के आयोजित राउंड टेबल कांफ्रेंस में बोलते हुए राजीव कुमार ने कहा कि नेशनल मेडिकल कमीशन बिल को संसदीय स्थाई समिति को भेज दिया गया है। उनका कहना है कि इस बिल का पास होना संदेहास्पद है क्योंकि दक्षिण भारत के कई मेडिकल कालेजों के मालिक संसद के सदस्य हैं।
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उन्होंने किसी का नाम लिए बगैर कहा कि स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में बदलाव की बातें करना असंभव हैं, क्योंकि इसमें लोगों के अपने निहित हित छिपे हुए हैं। उन्होंने बताया कि इस बिल में मेडिकल की पढ़ाई में अनापशनाप फीस को लेकर नियंत्रण करने की बात कही गई थी, लेकिन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने इसका जमकर विरोध किया।

स्किल ट्रैनिंग में घोटाले की ‘बू’

राजनीतिज्ञों और ब्यूरोक्रेट्स की साठगांठ पर बोलते हुए राजीव कुमार ने कहा कि स्किल ट्रेनिंग में भविष्य में बड़ा घोटाला हो सकता है, क्योंकि इसमें पॉलिटिशियंस घुस आए हैं।

उन्होंने आगे  कहा कि कुछ जगहों पर स्किल डेवलेपमेंट ट्रेनिंग के नाम पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति स्कॉलरशिप फंड में धांधलियां सामने आ रही हैं और स्कॉलरशिप का पैसा पैरेंट्स और ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स की जेब में जा रहा है। छात्रों को केवल सर्टिफिकेट ही मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि ‘हितों के टकराव’ को परिभाषित करने की जरूरत है।
 
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NITI Aayog
कानून नहीं जनांदोलन की जरूरत

राजीव कुमार का कहना है कि कानून बनाने से समस्या का हल नहीं होता। दहेज प्रथा रोकने के लिए कानून है, लेकिन बावजूद इसके हमारे समाज में दहेज प्रथा व्याप्त है। उन्होंने कहा कि एससी-एसटी कानून है, लेकिन लगातार उत्पीड़न के मामले सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी भी मानते हैं कि ऐसे मसलों पर कानून बनाने की जगह जनसमूह से यह बात उठ कर संसद में पहुंचनी चाहिए। 

कुपोषण का जिक्र करते हुए कहा कि पिछले 50 साल से कुपोषण को खत्म करने को लेकर अभियान चलाया जा रहा है। लेकिन हजारों-करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी देश के 38 फीसदी अभी भी कुपोषित हैं। उन्होंने इसके पीछे वजह बताते हुए कहा कि कोई जनांदोलन न होने की वजह से हम अभी तक कुपोषण को जड़ से खत्म नहीं कर पाए हैं।

जापान में पैराशूट यानी अकादोरी प्रथा

उन्होंने कहा कि जापान इंक का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां ‘अकादोरी’ प्रथा है, जिसमें अफसरों का 55 साल की उम्र होने पर उनकी योग्यता का पता लगाया जाता है। जो अफसर कमजोर दिखते हैं उन्हें प्राइवेट कंपनियों में ‘पैराशूट’ की तरह भेजा जाता है। जापानियों का आकलन है कि इससे उन्हें बहुत फायदा मिलता है और सरकार की नीतियों के मुताबिक कंपनियों को ढालने में मदद मिलती है।

संविधान में हो संशोधन

उनका कहना है कि अगर ‘हितों के टकराव’ के टकराव को लेकर कोई कानून बनाया जाता है, तो उसे किस संस्था के तहत बनाया जाए। यह जानने की जरूरत है कि यह कानून विधि मंत्रालय के तहत बनया जाए या कंपनी मामलों के मंत्रालय में। वहीं, अगर यह कानून नीति आयोग में बनाया जाता है, तो कौन इसकी देखरेख करेगा। साथ ही यह पता लगाए जाने की जरूरत है कि हमारे संविधान में इसे कहां और किस तरह से परिभाषित किया गया है अथवा इसे शामिल करने के लिए क्या संविधान में संशोधन की आवश्यकता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में जारी हो गाइडलाइंस

वहीं स्वदेशी जागरण मंच की मांग है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में ‘हितों के टकराव’ को लेकर कानून बनाया जाए। स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक अश्विनी महाजन का कहना है कि केन्द्र सरकार जनहितकारी नीतियां बनाने में हितों के टकरावों का प्रबंधन करे, साथ ही इस पर गाइडलाइंस भी जारी करे। उन्होंने कहा कि देश की स्वास्थ्य एवं पोषण नीतियों में ‘हितों के टकराव’ के चलते नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है और केन्द्र सरकार इस बारे में कोई गंभीर कदम नहीं उठा रहा है।
 
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