नीति आयोग के चौथे स्वास्थ्य सूचकांक के मुताबिक, समग्र स्वास्थ्य सेवाओं के प्रदर्शन के मामले में बड़े राज्यों में केरल एक बार फिर से शीर्ष पर है। वहीं उत्तर प्रदेश में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु व तेलंगाना स्वास्थ्य मानकों के मामले में क्रमशः दूसरे व तीसरे पायदान पर है। वहीं छोटे राज्यों में मिजोरम समग्र स्वास्थ्य सेवाओं के प्रदर्शन में शीर्ष पर है।
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ऐसा पहली बार नहीं है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में केरल ने यह उपलब्धि हासिल की है। नीति आयोग की 'स्वस्थ राज्य प्रगतिशील भारत' नामक स्वास्थ्य सूचकांक की 2015-16 के रिपोर्ट में भी केरल को स्वास्थ्य क्षेत्र में शीर्ष प्रदर्शन करने वाले राज्य के रूप में पहला स्थान मिला था। कोरोना संक्रमण की पहली लहर के दौरान भी केरल ने सक्रियता दिखाते हुए महामारी पर अंकुश लगाने में कामयाबी हासिल की थी और इसकी तारीफ भी हुई थी।
हालांकि कोरोना की दूसरी लहर के बाद जुलाई तक महाराष्ट्र और केरल से सबसे ज्यादा मामले सामने आ रहे थे और यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि कोरोना की तीसरी लहर केरल से आ सकती है। इसे लेकर सियासत भी शुरू हो गई थी। तब भी विशेषज्ञ मान रहे थे कि केरल में स्वास्थ्य सुविधाएं चरमराईं नहीं।
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कोरोना वायरस (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : PTI
महामारी रोग विशेषज्ञ और पब्लिक हेल्थ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के प्रोफसर डॉ गिरिधर बाबू ने मीडिया को दिए अपने बयान में कहा था कि केरल में संक्रमण के बढ़ते मामलों को लेकर आशंकाएं बंद होनी चाहिए। अभी भी केरल का उदाहरण बेहतर है। यहां कम लोगों की मौत हुई है। ज्यादा लोगों को वैक्सीन दिए जाने के चलते अस्पताल आने वाले लोगों की संख्या भी कम है। तिरुवनंतपुरम मेडिकल कॉलेज में कम्युनिटी मेडिसीन के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ अनीश टीएस ने भी मीडिया से कहा था ‘जब भी भारत में कोरोना संक्रमण के मामले कम हुए, केरल में संक्रमण मामलों का अनुपात ज्यादा दिखा। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए केरल में कभी ऑक्सीजन की कमी या अस्पतालों में बेड की कमी नहीं हुई।'
समझिए कि केरल क्यों सबसे ‘हेल्दी’ है
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि केरल का एक अनूठा स्वास्थ्य मॉडल है। 2018 में नीति आयोग के सदस्य डॉ वी के पॉल ने केरल के बेहतर स्वास्थय सुविधाओं के पीछे की वजह यह बताई थी कि केरल स्वास्थ्य पर निरंतर ध्यान देने वाले राज्यों में से एक है। उन्होंने कहा था कि केरल को एक उत्तरदायी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली मिली है।
केरल ने एक बहुस्तरीय स्वास्थ्य प्रणाली बनाने के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश किया और एकीकृत प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल कवरेज का विस्तार किया।
नवजात मृत्यु दर (एनएमआर), पांच साल से कम उम्र के मृत्यु दर (यू 5 एमआर) और लिंग अनुपात जैसे कई स्वास्थ्य परिणामों के मानकों पर राज्य का प्रदर्शन लगातार बेहतर रहा है।
केरल स्वास्थ्य सुविधााएं (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : PTI
केआईएमएस हेल्थकेयर ग्रुप त्रिवेंद्रम के अध्यक्ष और एमडी डॉ एम आई सहदुल्ला ने फरवरी 2017 में दिए एक बयान मे कहा था कि केरल में स्वास्थ्य सेवा का परिदृश्य कई मापदंडों में आगे है। उनके मुताबिक केरल ने यह प्रगति एक बहुत अच्छे बुनियादी ढांचे के कारण हासिल की है। जिसमें एक बेहतर सरकारी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा वितरण प्रणाली को विकसित किया जा सके।
डॉक्टरों की संख्या बढ़ाई
विभिन्न रिपोर्टस के मुताबिक केरल ने तेजी से चिकित्सा सुविधाओं, अस्पताल के बिस्तरों और डॉक्टरों की संख्या को बढ़ाया। 1960 से 2010 तक, डॉक्टरों की संख्या 1200 से बढ़कर 36,000 हो गई।
वहीं 1960 और 2004 के बीच प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं की संख्या 369 से बढ़कर 1356 हो गई।
केरल ने समय और सुशासन के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में एक ठोस आधार बनाया है। इसमें निजी क्षेत्र का भी योगदान है। पिछले दो दशकों में केरल में कई निजी अस्पताल खुले हैं।
केरल के लोगों का साक्षर और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना भी इसकी एक बड़ी वजह मानी जाती है।
पर्याप्त स्वच्छता (पीने के पानी और शौचालय सहित) कई ऐसे पहलूओं पर ध्यान दिया गया जिससे लोग कम बीमार पड़ें।
महिला शक्तिकरण पर जोर
इसके अलावा राज्य ने महिला सशक्तिकरण पर भी ध्यान केंद्रित किया है और मुख्य प्राथमिकताओं के रूप में स्वास्थ्य और शिक्षा पर जोर दिया है।
केरल अपनी स्वास्थ्य नीति नियोजन में आगे की सोच रहा है। 60 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों की जनसंख्या का अनुपात 2050 तक दोगुना होने की उम्मीद है।
राज्य पहले से ही उनके लिए चिकित्सा देखभाल वार्ड और अनुकूल सुविधाओं को तैयार कर रहा है।