निर्भया गैंगरेप मामले की 16 दिसंबर को पांचवी बरसी है। निचली अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक दोषियों को फांसी की सजा की पुष्टि होने के बावजूद सजा पर अमल नहीं हो पा रहा है। दरअसल कानून की खामी, मानवाधिकार व दोषियों के अधिकार के चलते वे फांसी की सजा से दूर हैं।
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उन्हें कब फांसी मिलेगी यह कोई भी नहीं जानता। दरअसल 16 दिसंबर 2012 को हुई दरिंदगी ने पूरे देश को हिला दिया था, तब न्यायपालिका ने जिस प्रकार चुस्ती दिखाते हुए विशेष अदालतों का गठन किया और जल्द सुनवाई कर सजा दी उससे लगने लगा कि संभवत: अब रेप की घटनाओं पर अंकुश लगेगा।
लेकिन कानून की खामियों व दोषियों के मानवाधिकार के चलते रेप हो या फिर अन्य अपराध कम नहीं हो रहे। देश की सर्वोच्च अदालत ने 5 मई 2017 को सभी दोषियों को फांसी की सजा पर मुहर लगाई थी लेकिन उस पर अमल आज तक नहीं हो पाया।
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दोषी कोई न कोई तर्क देकर याचिका दायर कर देते हैं और सजा पर अमल रुक जाता है। अभी दोषियों के पास सजा रुकवाने के कई विकल्प मौजूद हैं। वे राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर कर सकते हैं और यदि उनकी दया याचिका खारिज होती है तो वे पुन: अदालत का भी दरवाजा खटखटा सकते हैं।