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निर्भया केस: 99 फीसदी पीड़ितों ने पुलिस को 'बहुत अच्छा' रैंक देने से किया था मना, रिपोर्ट में खुलासा

Thu, 09 Jan 2020 11:45 AM IST
Priyesh Mishra जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
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Police - फोटो : Police
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निर्भया कांड के फौरन बाद चश्मदीद गवाह द्वारा सार्वजनिक तौर पर यह कहना कि दिल्ली में एफआईआर दर्ज कराने के लिए आम आदमी हिम्मत नहीं जुटा पाता, इस बात ने पुलिस की कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी थी। साल 2012 में यह बात सामने आई कि दिल्ली में पीड़ित की मदद करने या गवाह बनने जैसे मामलों में पुलिस का रवैया सहयोगी नहीं होता। 
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उस गवाह की यह बात इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के मानवाधिकार विभाग द्वारा जारी सर्वे रिपोर्ट से पूरी तरह मेल खाती थी। यह रिपोर्ट निर्भया कांड से पहले नेशनल पुलिस अकादमी के निदेशक रह चुके और मानवाधिकार आयोग के पूर्व डीजी एवं स्पेशल रेपोर्टियर रहे शंकर सेन (रिटायर्ड आईपीएस) के निर्देशन में तैयार की गई थी। 

निर्भया कांड के दौरान यह रिपोर्ट खासी चर्चा में रही थी। सर्वे रिपोर्ट में दिल्ली-एनसीआर के 578 पीड़ितों से बातचीत की गई। 99 फीसदी पीड़ितों ने दिल्ली पुलिस को 'बहुत अच्छा' रैंक देने से मना कर दिया था। 
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उस वक्त सिविल सोसायटी के सदस्यों प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद कुमार और विपक्षी दलों के नेताओं ने कहा था कि पुलिस के आधुनिकीकरण पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। पुलिस का व्यवहार सुधारने और आम लोगों का विश्वास बहाल करने के लिए उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके बावजूद पुलिस का वो खौफ से भरा चेहरा और कार्यप्रणाली नहीं बदली जा सकी।

आम लोगों को छोड़िए, वीवीआईपी भी पुलिसिया धौंस के सामने नहीं टिक पाते। तत्कालीन गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिंह द्वारा 12 मार्च 2013 को लोकसभा में दी गई जानकारी में यह खुलासा हुआ था कि दिल्ली पुलिस के खिलाफ शिकायतें मिलने का सिलसिला देश में सबसे तेज है। उसी दौरान इंडिया गेट पर हुए लाठीचार्ज और उसके बाद निर्दोष युवाओं को फंसाना, ऐसे मामलों में भी दिल्ली पुलिस की जमकर किरकिरी हुई थी। 

रिपोर्ट में सामने आया था कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 19 फीसदी लोग आपराधिक वारदात का शिकार होने के बाद भी पुलिस में मामला दर्ज नहीं कराते। वजह, किसी को पुलिस से डर लगता है तो कोई इसलिए शिकायत नहीं देता कि उसे पुलिस प्रशासन पर भरोसा ही नहीं है। पूर्व आईपीएस शंकर सेन का कहना था कि पुलिस को अपनी डर वाली छवि से बाहर निकलना होगा। खाकी पर लगे दाग हटेंगे तभी लोगों का पुलिस के प्रति भरोसा जागेगा।

भरोसा नहीं तो 45 प्रतिशत लोग पुलिस को आपराधिक घटना की सूचना देने का साहस नहीं जुटा पाते...  
रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकांश लोगों को पुलिस की कार्यप्रणाली पर भरोसा नहीं होता। इस वजह से 45 प्रतिशत लोग पुलिस को आपराधिक घटना की सूचना देने का साहस नहीं जुटा पाते। 19 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें पुलिस के पास जाने से डर लगता है, जबकि 39 प्रतिशत लोगों ने पुलिस प्रशासन पर भरोसा नहीं होने की बात कही। 

सर्वे में शामिल लोगों ने बताया कि 29 फीसदी मामलों में पुलिस जानबूझ कर केस दर्ज नहीं करती। यदि पुलिस केस दर्ज भी कर लेती है तो 63 फीसदी पीड़ितों को उसकी प्रगति की जानकारी नहीं होती। केस के बारे में पीड़ित की संतुष्टि, इस बाबत 61 प्रतिशत लोगों की राय नकारात्मक रही।

रिपोर्ट के अहम अंश, जिसने निर्भया केस के दौरान खोली दिल्ली पुलिस की पोल... 
खास बात है कि इस सर्वे में जिन लोगों से बातचीत कर रिपोर्ट तैयार की गई, वे किसी न किसी रूप में अपराध की घटना से सीधे जुड़े रहे थे। सर्वे रिपोर्ट में दिल्ली-एनसीआर के 578 पीड़ितों से बातचीत की गई। इनमें 62 फीसदी पुरुष और 38 प्रतिशत महिलाएं शामिल थी।

विभिन्न आय वर्ग के लोगों को प्रतिनिधित्व ...

एक लाख से कम आय: 33 प्रतिशत
एक से दो लाख: 32
दो से पांच लाख: 22
पांच से दस लाख: 6
दस लाख से ज्यादा: 2
कोई उत्तर नहीं: 5

आयु के अनुसार...
20 से 30 वर्ष: 34 प्रतिशत
30 से 40 वर्ष: 41
40 से 50: 20
50 से 60: 4
60 से ऊपर: कोई नहीं

पांच वर्ष में आपराधिक वारदात का सामना किया...
एक बार: 69 फीसदी बोले 
दो बार: 17
तीन बार: 4
चार बार: 1
पांच बार: कोई नहीं
पांच से ज्यादा: 3
कोई उत्तर नहीं: 6
 

किस तरह के अपराध का सामना किया ... 

व्यक्तिगत चोरी: 66 प्रतिशत
चोरी व लूटपाट: 14
व्यक्ति के साथ अपराध: 23
कोई उत्तर नहीं: 1
महिलाओं के साथ अपराध
नारी शोषण: 24 प्रतिशत
छेड़छाड़: 56
फब्तियां कसना: 37

भरोसा नहीं होने के कारण पुलिस को आपराधिक घटना की सूचना देना... 
नहीं: 45 प्रतिशत
हां:  51
कोई उत्तर नहीं: 4

पुलिस तक मामला न पहुंचाने की वजह... 
पुलिस के पास जाने में डर लगता है: 19 प्रतिशत
शर्म और लांछन का डर: 12
पुलिस प्रशासन पर भरोसा नहीं: 39
जागरूकता की कमी: 26
पहुंच नहीं: 6
अन्य: 1
कोई उत्तर नहीं: 10

केस दर्ज करने में पुलिस की देरी:
-हां: 29 फीसदी
-नहीं: 57
-कोई उत्तर नहीं: 14
देरी का कारण बताया
-पुलिस की इच्छा नहीं होती: 45 प्रतिशत
-अन्य कामों में व्यस्त: 15
-अपराधियों का प्रभाव: 13
-अन्य: 25
-कोई उत्तर नहीं: 12

पुलिस का व्यवहार
सहयोगी: 49 प्रतिशत
असहयोगी: 23
संवेदनापूर्वक: 13
अटपटा: 10
डराना: 3
गाली गलौच: 3
कोई उत्तर नहीं: 5
 

पुलिस सेवा को मिली यह रेटिंग

बहुत बुरी: 6 प्रतिशत
असंतुष्ट: 39
संतुष्ट: 32
अच्छा: 12
बहुत अच्छा: 1
कोई उत्तर नहीं: 9

अपराधियों की गिरफ्तारी बाबत जानकारी
हां: 11 प्रतिशत
नहीं: 76
कोई उत्तर नहीं: 13

पुलिस द्वारा केस प्रगति की कोई जानकारी देना
हां: 24 प्रतिशत
नहीं: 63
कोई उत्तर नहीं: 13

केस के बारे में पीड़ित की संतुष्टि
हां: 18 प्रतिशत
नहीं: 61
कोई उत्तर नहीं: 21

 
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निर्भया कांड के बाद इन दो लोगों ने पुलिस को लेकर की थी ये टिप्पणी...

तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था, पुलिस को सभी शिकायतें एफआईआर के तौर पर दर्ज करनी चाहिएं।शिकायत मिलने के बाद एसएचओ एफआईआर दर्ज करने या न करने का कारण पूछ सकता है।यदि कोई शिकायत झूठी लगती है तो भी एफआईआर जरूर दर्ज करें और केस की फाइल बंद करने से पहले उसकी जांच अवश्य कर लें।यह सलाह उन्होंने सभी राज्यों को दी थी।इसके बाद दिल्ली में ख़ासतौर पर महिलाओं के साथ होने वाले सभी छोटे बड़े अपराधों की सूचना मिलते ही बिना किसी देरी के एफआईआर दर्ज की जाने लगी।

जूलियो रिबेरो (पूर्व आईपीएस) ने कहा, पुलिस को सभी तरह के राजनीतिक दबाव से मुक्त बनाना होगा।जब तक पुलिस महकमें में राजनीतिक हस्तक्षेप है, सुधार नहीं होगा।पुलिस आयुक्त को सभी निर्णय लेने दें।यहां तक कि डीसीपी की पोस्टिंग और तबादले का अधिकार भी पुलिस प्रमुख को मिले।इस मुहिम में पुलिस को भी अपने व्यवहार में तबदीली लानी होगी।यही समय है कि अब सरकारों को जागना होगा, नहीं तो स्थिति इतनी बिगड़ जाएगी कि उसे संभालना बेहद मुश्किल होगा।
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