रिपोर्ट में सामने आया था कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 19 फीसदी लोग आपराधिक वारदात का शिकार होने के बाद भी पुलिस में मामला दर्ज नहीं कराते। वजह, किसी को पुलिस से डर लगता है तो कोई इसलिए शिकायत नहीं देता कि उसे पुलिस प्रशासन पर भरोसा ही नहीं है। पूर्व आईपीएस शंकर सेन का कहना था कि पुलिस को अपनी डर वाली छवि से बाहर निकलना होगा। खाकी पर लगे दाग हटेंगे तभी लोगों का पुलिस के प्रति भरोसा जागेगा।
भरोसा नहीं तो 45 प्रतिशत लोग पुलिस को आपराधिक घटना की सूचना देने का साहस नहीं जुटा पाते...
रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकांश लोगों को पुलिस की कार्यप्रणाली पर भरोसा नहीं होता। इस वजह से 45 प्रतिशत लोग पुलिस को आपराधिक घटना की सूचना देने का साहस नहीं जुटा पाते। 19 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें पुलिस के पास जाने से डर लगता है, जबकि 39 प्रतिशत लोगों ने पुलिस प्रशासन पर भरोसा नहीं होने की बात कही।
सर्वे में शामिल लोगों ने बताया कि 29 फीसदी मामलों में पुलिस जानबूझ कर केस दर्ज नहीं करती। यदि पुलिस केस दर्ज भी कर लेती है तो 63 फीसदी पीड़ितों को उसकी प्रगति की जानकारी नहीं होती। केस के बारे में पीड़ित की संतुष्टि, इस बाबत 61 प्रतिशत लोगों की राय नकारात्मक रही।
रिपोर्ट के अहम अंश, जिसने निर्भया केस के दौरान खोली दिल्ली पुलिस की पोल...
खास बात है कि इस सर्वे में जिन लोगों से बातचीत कर रिपोर्ट तैयार की गई, वे किसी न किसी रूप में अपराध की घटना से सीधे जुड़े रहे थे। सर्वे रिपोर्ट में दिल्ली-एनसीआर के 578 पीड़ितों से बातचीत की गई। इनमें 62 फीसदी पुरुष और 38 प्रतिशत महिलाएं शामिल थी।
तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था, पुलिस को सभी शिकायतें एफआईआर के तौर पर दर्ज करनी चाहिएं।शिकायत मिलने के बाद एसएचओ एफआईआर दर्ज करने या न करने का कारण पूछ सकता है।यदि कोई शिकायत झूठी लगती है तो भी एफआईआर जरूर दर्ज करें और केस की फाइल बंद करने से पहले उसकी जांच अवश्य कर लें।यह सलाह उन्होंने सभी राज्यों को दी थी।इसके बाद दिल्ली में ख़ासतौर पर महिलाओं के साथ होने वाले सभी छोटे बड़े अपराधों की सूचना मिलते ही बिना किसी देरी के एफआईआर दर्ज की जाने लगी।
जूलियो रिबेरो (पूर्व आईपीएस) ने कहा, पुलिस को सभी तरह के राजनीतिक दबाव से मुक्त बनाना होगा।जब तक पुलिस महकमें में राजनीतिक हस्तक्षेप है, सुधार नहीं होगा।पुलिस आयुक्त को सभी निर्णय लेने दें।यहां तक कि डीसीपी की पोस्टिंग और तबादले का अधिकार भी पुलिस प्रमुख को मिले।इस मुहिम में पुलिस को भी अपने व्यवहार में तबदीली लानी होगी।यही समय है कि अब सरकारों को जागना होगा, नहीं तो स्थिति इतनी बिगड़ जाएगी कि उसे संभालना बेहद मुश्किल होगा।