सिंगापुर में पीड़िता की मौत
एक तरफ जहां सड़क से लेकर सोशल मीडिया और संसद भवन में इस कांड की चर्चा हो रही थी। वहीं दूसरी करफ पीड़िता की हालत नाजुक बनी हुई थी। उसे वेंटिलेटर पर रखा गया था। कई सर्जरी के बाद भी पीड़िता ठीक नहीं हो पा रही थी। जनाक्रोश की वजह से सरकार को बेहतर इलाज के लिए उसे सफदरजंग से हटाकर सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालांकि 29 दिसंबर की रात को करीब सवा दस बजे निर्भया ने सिंगापुर दम तोड़ दिया था।
फास्ट ट्रैक और दिल्ली हाईकोर्ट ने दी सजा-ए-मौत
सभी चार आरोपियों के खिलाफ दिल्ली की फास्ट ट्रैक में मामला चलाया गया। कोर्ट ने 10 सितंबर, 2013 को सभी आरोपियों को मौत की सजा सुनाई। जिसके बाद आरोपियों ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 जनवरी 2014 को अपना फैसला सुरक्षित रखा और 13 मार्च 2014 को फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने का फैसला सुनाते हुए उनकी सज-ए-मौत बरकरार रखी।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
चारों आरोपियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मामले में दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने 27 मार्च 2017 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इसके बाद 5 मई 2017 को अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सभी की फांसी की सजा पर मुहर लगा दी थी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि इस घटना ने इंसानियत को शर्मसार करने का काम किया है। सोमवार को तीन आरोपियों द्वारा दायर की गई पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।
निर्भया के बाद इन कानूनों में हुए बदलाव
निर्भया कांड के बाद 3 फरवरी 2013 को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 181 और 182 में संशोधन किया गया। इसके तहत बलात्कार से जुड़े कानून को पहले से ज्यादा सख्त बनाया गया। बलात्कार के आरोपियों को फांसी की सजा मिल सके इसका प्रवाधन किया गया। इसके अलावा बलात्कार की सजा को 7 साल से बढ़ाकर 10 साल कर दिया गया। 22 दिसंबर 2015 को संसद में जुवेनाइल जस्टिस बिल लाया गया। जिसके अंतर्गत 16 साल या उससे अधिक उम्र के आरोपियों को जघन्य अपराध करने पर बालिग मानते हुए व्यस्कों की तरह सजा देने का प्रावधान किया गया। इसके अलावा बलात्कार, बलात्कार से हुई मृत्यु, सामूहिक दुष्कर्म और एसिड-अटैक जैसे महिलाओं के साथ होने वाले अपराध जघन्य अपराध की श्रेणी में लाए गए।
जेएस वर्मा कमिटी
निर्भया कांड के बाद देश में बलात्कार और यौन शोषण से जुड़े मामलों में कानून को बेहतर बनाने के लिए एक समिति का गठन किया गया। जस्टिस जेएस वर्मा के नेतृत्व में एक समिति बनाई गई जिसे कि सरकार को अपनी सिफारिश देनी थी। सरकार के सामने समिति ने इन मामलों से जुड़े कानून को सख्त बनाने की जरूरत पर बल दिया था। जस्टिस वर्मा ने लड़कियों का पीछा करने, घूरने जैसे अपराध को सजा के अंतर्गत लाने का सुझाव दिया था। समिति ने 29 दिनों में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी और उसे 80 हजार सुझाव मिले थे। समिति ने यह सिफारिशे की थीं:
-महिला के कपड़े फाड़ने की कोशिश पर 7 साल की सजा
-बदनीयती से देखने या अश्लील इशारे करने पर 1 साल की सजा
-इंटरनेट पर जासूसी करने पर 1 साल की सजा
-मानव तस्करी के मामले में पीड़ित की सहमति गैरजरूरी हो और 7 साल की सजा दी जाए। बच्चों की तस्करी के मामले में सरकार ठोस कदम उठाए और एक डेटाबेस बनाए।
-बलात्कार के मामले दर्ज करने में नाकाम रहने या देरी करने वाले अफसरों पर कार्रवाई होनी चाहिए
-पीड़िता की मेडिकल जांच के लिए दिया गया प्रोटोकॉल लागू किया जाए
-सैन्य बलों की तरफ से यौन हिंसा को सामान्य कानून के तहत लाया जाए
-हिंसाग्रस्त इलाकों में महिला अपराधों की जांच के लिए स्पेशल कमिश्नर तैनात हों