राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने गंगा में मिलने वाली नदियों में अनुपचारित सीवेज के गिरने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार को जमकर फटकार लगाई। एनजीटी ने कहा कि ऐसा कोई भी संकेत नहीं मिलता है कि इस ‘प्रदूषण अपराध’ को राज्य सरकार द्वारा कैसे रोका जाएगा।
हालात को बहुत ही असंतोषजनक करार देते हुए जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली एनजीटी की एक पीठ ने कहा कि गोरखपुर में रामगढ़ ताल के साथ ही आमी, राप्ती और रोहिणी नदियों के प्रदूषण को खत्म करने के लिए सुधारात्मक कार्रवाई किए जाने की जरूरत है। एक समिति द्वारा दाखिल रिपोर्ट का अवलोकन करते हुए पीठ ने कहा कि अधिकारियों द्वारा अपनी सार्वजनिक कर्तव्यों के अनुपालन में घोर लापरवाही बरती जा रही है।
पीठ ने कहा कि यही उपयुक्त समय है कि मुख्य सचिव ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, गंगा के कायाकल्प, अनुपचारित सीवेज के डिस्चार्ज को रोकने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए मामले की व्यक्तिगत रूप से समीक्षा करें।
एनजीटी ने यूपी के मुख्य सचिव को आमी, राप्ती, रोहिणी, सरयू और घाघरा नदियों के कायाकल्प योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करने का निर्देश दिया और आवश्यक बजटीय मदद के साथ कायाकल्प के लिए समयसीमा तय करने और इसके लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय करने को भी कहा। पीठ ने कहा कि इस तरह की परियोजनाओं में स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन के जरिए वित्तीय मदद के बहाने देरी नहीं की जा सकती है। गंगा या अन्य जल निकायों में प्रदूषण के निर्वहन को नहीं रोकना जल अधिनियम के तहत आपराधिक अपराध है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत ऐसे अपराधों के लिए जवाबदेह अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है।
प्लास्टिक पेन भी प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत आते हैं : एनजीटी
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने कहा है कि प्लास्टिक पेन भी प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत आते हैं और उसने पर्यावरण मंत्रालय को अपशिष्ट प्रबंधन के लिए विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) व्यवस्था को अंतिम रूप देने का निर्देश दिया है।
एनजीटी चेयरपर्सन जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की पीठ ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को ईपीआर को लेकर राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (पीसीबी) और राज्य स्तरीय निगरानी समितियों से भी समन्वय बनाने को कहा है। पीठ ने कहा कि हालांकि पेन का नियमों में कोई खास जिक्र नहीं है लेकिन वे भी अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के नियम तीन (ओ) के तहत ‘प्लास्टिक’ की परिभाषा में शामिल हैं। इसलिए पेन भी वैधानिक ढांचे के दायरे में आता है।
एनजीटी ने पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे प्लास्टिक के पेन के बेरोकटोक इस्तेमाल के खिलाफ अवनी मिश्रा की याचिका की सुनवाई के दौरान यह व्यवस्था दी। याचिकाकर्ता ने कहा था कि रोजाना करीब 27 लाख पेनों का उत्पादन होता है और स्थानीय निकायों के लिए इन्हें एकत्र करना और नियमों के तहत इनका निपटान करना संभव नहीं है। साथ ही कहा कि रिफिल काफी महंगी पड़ती है, इसके चलते लोग नया पेन खरीदने को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में इन्हें जलाना प्रदूषण की वजह बनता है।