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चिंताजनक: दूषित हवा फेफड़ों के लिए ही नहीं, दिमाग और नसों के लिए भी घातक; नए अध्ययन ने चेताया

Thu, 29 Jan 2026 11:36 AM IST
लव गौर अमर उजाला नेटवर्क

सार

New Study Warns: एक नए अध्ययन ने चेताया है कि लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से मोटर न्यूरॉन डिजीज जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
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दिल्ली में प्रदूषण - फोटो : ANI / अमर उजाला
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विस्तार
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हवा में घुला जहर अब सिर्फ फेफड़ों और दिल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह धीरे-धीरे इंसानी दिमाग और नसों पर भी गहरा असर डाल रहा है। स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टीट्यूट से जुड़े वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन ने चेताया है कि लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से मोटर न्यूरॉन डिजीज जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। यह शोध प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल जामा न्यूरोलॉजी में प्रकाशित हुआ है और इसके नतीजे भारत जैसे अत्यधिक प्रदूषित देशों के लिए खास तौर पर चिंताजनक संकेत देते हैं।
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इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने वायु प्रदूषण और एमायोट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (एएलएस) के बीच संबंध की गहराई से जांच की। एएलएस मोटर न्यूरॉन डिजीज (एमएनडी) का सबसे आम रूप है और कुल मामलों के लगभग 85 से 90 प्रतिशत में यही बीमारी पाई जाती है। शोध के मुताबिक, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेना दिमाग और नसों से जुड़ी बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है, भले ही वह इलाका दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में शामिल न हो। मोटर न्यूरॉन डिजीज एक गंभीर और धीरे-धीरे बढ़ने वाली न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें वे नसें प्रभावित होती हैं जो शरीर की स्वैच्छिक गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं। इस बीमारी में मांसपेशियां सिकुड़ने लगती हैं, उनमें कमजोरी आ जाती है और समय के साथ चलने-फिरने, बोलने और सांस लेने तक में दिक्कत होने लगती है। कई मामलों में यह स्थिति लकवे और समय से पहले मृत्यु तक पहुंच सकती है।

अध्ययन से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता जिंग वू ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि स्वीडन में वायु प्रदूषण का स्तर दुनिया के कई हिस्सों की तुलना में काफी कम है, इसके बावजूद यहां भी प्रदूषण और मोटर न्यूरॉन डिजीज के बीच स्पष्ट संबंध दिखाई दिया। उनके मुताबिक यह इस बात का मजबूत संकेत है कि हवा की गुणवत्ता में सुधार केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी बेहद जरूरी है।
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भारत जैसे देशों के लिए गंभीर चेतावनी
हालांकि यह अध्ययन स्वीडन में किया गया, जहां वायु प्रदूषण अपेक्षाकृत कम है, लेकिन इसके नतीजे भारत जैसे देशों के लिए कहीं ज्यादा गंभीर संकेत देते हैं। भारत में कई शहरों की हवा अक्सर डब्ल्यूएचओ मानकों से कई गुना ज्यादा प्रदूषित रहती है, ऐसे में दिमाग और नसों से जुड़ी बीमारियों का खतरा और भी बढ़ सकता है।

स्वच्छ हवा दिमागी सेहत की बुनियाद
यह शोध साफ तौर पर बताता है कि स्वच्छ हवा केवल फेफड़ों और दिल की जरूरत नहीं है, बल्कि यह दिमागी सेहत और जीवन की गुणवत्ता की भी बुनियाद है। आज भले ही वायु प्रदूषण को नजरअंदाज करना आसान लगे, लेकिन वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले वर्षों में इसकी कीमत हमें अपनी सेहत और जीवन से चुकानी पड़ सकती है।

कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं, लेकिन खतरे के संकेत साफ
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि अध्ययन यह साबित नहीं करता कि वायु प्रदूषण सीधे तौर पर मोटर न्यूरॉन डिजीज की वजह है। हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि दूषित हवा नसों में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा कर सकती है, जो समय के साथ तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचाता है और ऐसी बीमारियों की आशंका बढ़ा देता है।
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