विपक्षी गठबंधन इंडिया की राह आसान नहीं है। सीट बंटवारे के फार्मूले पर फंसे पेच के बीच बिहार में राजद और जदयू के बीच बढ़ी खटास ने गठबंधन की परेशानी बढ़ा दी है। महाराष्ट्र,बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय दल कांग्रेस के साथ को महत्व नहीं दे रहे। दूसरी ओर दिल्ली, हरियाणा, गुजरात में आम आदमी पार्टी ने सीट बंटवारे को उलझा दिया है। मुश्किल यह है कि गठबंधन की अगली बैठक से पहले सीट बंटवारे से संबंधित फार्मूले पर रविवार तक सहमति बन जानी चाहिए थी, मगर इस दिशा में गठबंधन एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाया है।
इस मामले में सबसे अहम दांव बिहार के सीएम नीतीश कुमार का है। राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह को चलता कर खुद इस पद पर आए नीतीश ने गठबंधन के नेता के तौर पर अपना दावा पेश कर दिया है। दावेदारी में मजबूती लाने के लिए नीतीश ने जातिगत जनगणना के सवाल पर पूरे देश में घूमने की योजना बनाई है। यह योजना ऐसे समय में बनाई गई है, जब गठबंधन की इसी महीने हुई बैठक में टीएमसी अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने गठबंधन के नेता के तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकाजुन खरगे का नाम आगे बढ़ाया था।
सीएम रहते चेहरा बनना चाहते हैं नीतीश
राजद की रणनीति थी कि नीतीश को गठबंधन का नेता या संयोजक बना कर तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सरकार का गठन किया जाए। इसके लिए राजद ने जदयू के अध्यक्ष पद से हटाए गए ललन सिंह को साधा था। इसके उलट नीतीश की योजना बिहार का सीएम रहते गठबंधन का नेता बनने की है। नीतीश ने राजद के दांव के काट के लिए ही अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की बलि ली है। अब खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद देशव्यापी दौरे की योजना बना कर नीतीश ने गठबंधन के नेता के तौर पर अपनी मजबूत दावेदारी पेश की है।
सामान्य नहीं रहे राजद-जदयू के रिश्ते
गठबंधन की बड़ी मुश्किल बिहार में राजद और जदयू के रिश्ते में आई खटास है। जदयू के नेता नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि राजद ने तेजस्वी की ताजपोशी के लिए ललन सिंह के साथ मिल कर पार्टी को तोड़ने की साजिश रखी। जाहिर तौर पर इसके बाद राजद—जदयू के बीच अविश्वास का वातावरण तैयार हुआ है।
अगली बैठक में साफ होगी तस्वीर
विपक्षी गठबंधन इंडिया बचेगा या नहीं इसकी तस्वीर इसकी अगली बैठक में साफ होगी। हालांकि सवाल है कि सीटों के बंटवारे पर फंसे पेच के बावजूद बैठक बुलाई भी जाएगी या नहीं? फिर नेता पद के लिए नीतीश की ओर से पेश की गई दावेदारी के इतर सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब जैसे राज्यों में खाली हाथ रहने के लिए तैयार है? जाहिर तौर पर कांग्रेस ऐसा नहीं चाहेगी। वह चाहेगी कि क्षेत्रीय दल भी उसके लिए दिल बड़ा करें।
कई राज्यों में क्षेत्रीय दल कांग्रेस से पहले ही बना रहे दूरी
विपक्षी गठबंधन कितना स्थाई है सीटों के बंटवारे का फार्मूला सामने आने के बाद ही इसका पता चल पाएगा। ताजा स्थिति यह है कि महाराष्ट्र में उद्धव गुट का शिवसेना, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, बिहार में राजद—जदयू, दिल्ली—पंजाब में आप और उत्तर प्रदेश में सपा कांग्रेस को भाव देने के मूड में नहीं है। चूंकि बिहार में गठबंधन का दायरा बहुत बड़ा है, ऐसे में राजद—जदयू कांग्रेस को दो—तीन सीटों पर, बंगाल में ममता बनर्जी दो—तीन सीटों पर, दिल्ली और पंजाब में आप कांग्रेस को इतनी ही सीटें देना चाहती हैं। मुश्किल यह है कि आप चाहती है कि कांग्रेस हरियाणा, गुजरात में उसके लिए बड़ा दिल दिखाए। ममता पश्चिम बंगाल में वाम दलों को एक भी सीट नहीं देना चाहतीं। ऐसे में सीटों के बंटवारे के फार्मूले पर सहमति बनती नहीं दिख रही।