लाल गलियारा जहां माओवादियों का बसेरा है। जहां ना कोई सड़क है, ना ही सरकार। यहां नक्सली अपनी सरकार चलाते हैं। अपने स्कूल चलाते हैं। यहां तक कि फसलचक्र भी निर्धारित करते हैं। लेकिन सीआरपीएफ की हालिया रिपोर्ट में इस बात का दावा किया गया है कि अब ये लाल गलियारे सिकुड़ रहे हैं।
बीते वर्ष अप्रैल में
गृह मंत्रालय की तरफ से यह बयान आया था कि
नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 106 से घट कर 68 रह गई है। लेकिन इस साल यह संख्या और भी कम हो गई है। अब इन जिलों की संख्या मात्र 58 ही रह गई है। सीआरपीएफ द्वारा संकलित नवीनतम डाटा दिखाता है कि 2015 से माओवादी हिंसा में काफी कमी आई है। साथ ही केवल चार राज्यों- बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा से ही 90% से अधिक हमलों की खबर सामने आ रही है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में एक ओर जहां नक्सली एक के बाद एक सुरक्षाबलों को निशाना बना रहे हैं वहीं सैन्य अधिकारी भी वरिष्ठ माओवादी नेताओं को अपना निशाना बना रहे हैं। सीआरपीएफ, आईएएफ,
बीएसएफ,
आईटीबीपी और राज्य बलों की मदद से इन इलाकों को नक्सल मुक्त बनाने की सरकार की कोशिश लगातार जारी है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को माओवादी मुक्त बनाने के लिए सरकार और राज्य प्रशासन दूर-दराज के गांवों में पुलिस स्टेशनों की स्थापना के अलावा, मोबाइल फोन टावरों की स्थापना और सड़कों के निर्माण जैसे विकास कार्य को तेजी से कर रही है।
सीआरपीएफ के डायरेक्टर जनरल राजीव राय भटनागर ने बताया कि हमने नक्सलियों को उनके घर में घुसकर मारा है। उन्होंने कहा कि नक्सलियों का प्रभाव केवल तीन इलाकों तक ही सीमित रह चुका है जिसमें- बस्तर-सुकमा(1200 वर्ग किमी), आंध्र-उड़ीसा बॉर्डर(2000 वर्ग किमी) और अबुजमाद का जंगल(4500 वर्ग किमी) शामिल हैं। नक्सलियों के खिलाफ बनाए गए एक्शन प्लान 2017-2022 के मुताबिक 2017 में 140 नक्सलियों को मार गिराया, जिनमें 30 महिलाएं भी शामिल थीं।