भारत की नागरिकता लेने देने का मसला केवल मौजूदा राजनीति का हिस्सा नहीं है, बल्कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से ये चल रहा है। इस वक्त तो केवल तीन देशों के लोगों की नागरिकता को लेकर बवाल मचा है, तब कॉमनवेल्थ के तहत आने वाले अनेक राष्ट्रों के लोगों को भारत की नागरिकता देने के लिए चुपके से कानून में प्रावधान कर दिया गया। खास बात है कि यह चुपके से हो रही यह तैयारी एक दो साल में पूरी नहीं हुई, बल्कि 1950 में ये प्रयास शुरू हो गए थे।
बनारस की सुभाष संस्था के महासचिव तमल सान्याल, जिन्होंने नागरिकता के मुदे की तह तक जाने के लिए कई जगहों पर आरटीआई लगाई है, का कहना है कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने नागरिकता के मसले पर कई बैठकें बुलाई थीं। चूंकि कॉमनवेल्थ के तहत आने वाले अनेक देशों के लोगों को नागरिकता देने का मामला था, इसलिए पांच साल के बाद यह मुद्दा निपटाया जा सका।
04 अगस्त 1951 को कैबिनेट की विदेशी मामलों की कमेटी की बैठक हुई। इसमें पीएम जवाहर लाल नेहरू के अलावा सी राजगोपालाचारी, एन गोपालास्वामी अयंगर और मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित कई लोग उपस्थित रहे। इस बैठक के बाद कॉमनवेल्थ देशों के लोगों को नागरिकता देने के मसौदे पर औपचारिक तौर से काम शुरू हो गया।
सान्याल के मुताबिक, 20 अगस्त 1951 को तत्कालीन विदेश सचिव बीके चक्रवर्ती के दफ्तर से एक नोट जारी हुआ। इसमें लिखा था कि कॉमनवेल्थ के देशों के नागरिकों को भारतीय नागरिकता का फायदा कैसे मिले, इस पर काम शुरू किया जा रहा है। इसका तरीका क्या होगा, यह भी देखना है। क्या इसके लिए संसद में अलग से बिल लाना होगा या दूसरे तरीके से कोई प्रावधान किया जा सकता है। उस वक्त सरकार में उच्च पदों पर बैठे लोगों की ओर से यह कहा गया है कि इससे संसद में सरकार की बदनामी होगी।
इसलिए तय किया गया कि अलग से बिल न लाकर एक्ट में ही कोई छोटा सा प्रावधान कर दिया जाए। वो ऐसा हो कि किसी का ध्यान उस तरफ न जाए। इस बात को ध्यान में रखकर एक प्रपोजल तैयार किया गया। प्रपोजल में लिखा था कि नागरिकता कानून 1955 के सेक्शन 16 के तहत कॉमनवेल्थ के लोगों को नागरिकता दी जा सकती है। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इस बाबत चुपके से सांसदों को उक्त प्रपोजल की प्रति वितरित करा दी। इसमें बताया गया कि नागरिकता कानून 1955 में यह प्रावधान कर दिया गया है।