सुप्रीम कोर्ट ने भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की नियुक्ति प्रक्रिया को असांविधानिक घोषित करने की मांग करने वाली जनहित याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। हालांकि जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह भी कहा, आखिरकार हमें अपनी संस्थाओं पर भरोसा रखना होगा क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 148 सुप्रीम कोर्ट के जजों की तरह ही इन संस्थाओं को भी संरक्षण देता है।
याचिकाकर्ता एनजीओ सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन के वकील प्रशांत भूषण ने पीठ के सामने दावा किया कि सीएजी की नियुक्ति केवल कार्यपालिका और प्रधानमंत्री की ओर से किया जाना सांविधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है। संक्षिप्त सुनवाई में भूषण ने तर्क दिया, यहां सवाल संस्था की स्वतंत्रता का है। उन्होंने दावा किया कि महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों में कैग की ओर से ऑडिट रोके जा रहे हैं और हाल के दिनों में कैग ने अपनी स्वतंत्रता खो दी है। भूषण ने तर्क दिया कि कैग की रिपोर्टों की संख्या कम हो गई है और कर्मचारियों की संख्या घट रही है।
इसपर पीठ ने हाल के वर्षों में कैग की स्वतंत्रता पर संदेह करने वाले किसी भी उदाहरण को रिकॉर्ड पर लाने को कहा। भूषण ने कहा, 2023 में संसद में केवल 18 कैग ऑडिट रिपोर्ट पेश की गईं जबकि पहले यह संख्या 40 थी। उन्होंने कहा, लंबे समय तक कैग की नियुक्ति काफी हद तक स्वतंत्र थी, लेकिन हाल में केंद्र, राज्यों और सार्वजनिक उपक्रमों की योजनाओं का ऑडिट करने वाली इस सांविधानिक संस्था की स्वतंत्रता को बाधित किया जा रहा है। सीएजी को उन राज्यों में योजनाओं का ऑडिट करने की अनुमति नहीं दी जा रही है, खासकर जहां केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी का शासन है। महाराष्ट्र के लिए ऑडिट टीमें तैयार थीं, लेकिन फिर आदेश आया कि चुनावों के बाद ऑडिट किया जाना चाहिए।
भूषण ने कहा, अदालत ने पहले सीबीआई निदेशक और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्तियों के संबंध में उनकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप किया था। सीएजी के लिए भी इसी तरह के निर्देश आवश्यक हैं। बाद में पीठ ने इस याचिका को इसी मुद्दे पर लंबित एक अन्य मामले के साथ जोड़ दिया।
अदालत किस हद तक हस्तक्षेप कर सकती है : जस्टिस सूर्यकांत
भूषण ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर 2023 के संविधान पीठ के फैसले का हवाला दिया जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश का एक पैनल बनाया गया था। भूषण ने कहा, सवाल यह है कि क्या पद से हटाने के खिलाफ दी गई सुरक्षा ही स्वतंत्रता की गारंटी के लिए पर्याप्त है। हालांकि, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पूछा कि अगर संविधान ने नियुक्ति की (केंद्र को) बेलगाम शक्ति प्रदान की है, तो क्या अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए और किस हद तक? उन्होंने पूछा, क्या यह सीएजी की नियुक्ति के प्रावधान को फिर से लिखने के बराबर नहीं होगा? इस पर भूषण ने कहा, कोर्ट पहले ही मुख्य सतर्कता आयुक्त व मुख्य सूचना आयुक्त जैसे सांविधानिक पदों की नियुक्ति में ऐसा दखल दे चुका है।
पीएम, नेता प्रतिपक्ष और चीफ जस्टिस मिलकर करें नियुक्ति
पीठ ने कहा, सीएजी की नियुक्ति में संविधान साफ कहता है कि नियुक्ति राष्ट्रपति की ओर से की जाएगी। पहले भी कोर्ट ने इस तरह की याचिकाएं सुनकर उसे खारिज किया है। इसपर भूषण ने कहा, एक याचिका अब भी लंबित है और जिन याचिकाओं को खारिज किया गया है वे सीएजी की नियुक्ति प्रक्रिया पर सीधे सवाल नहीं उठाती थीं। भूषण की याचिका में कोर्ट से मांग की गई है कि सीएजी की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की सदस्यता वाली निष्पक्ष समिति की सलाह पर राष्ट्रपति की ओर से की जाए।