सीपी राधाकृष्णन, एनडीए के राष्
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सबसे पहले सीपी राधाकृष्णन को जान लीजिए
सीपी राधाकृष्णन का जन्म 4 मई 1957 को तमिलनाडु के तिरुपुर जिले में हुआ। सीके पोन्नूसामी और के. जानकी के घर जम्मे राधाकृष्णन ने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक यानी बीबीए की पढ़ाई की है। आरएसएस के स्वयं सेवक राधाकृष्णन 1974 में भारतीय जनसंघ की राज्य कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने। 25 नवंबर 1985 को उनकी शादी आर. सुमति से हुई। दोनों का एक बेटा और एक बेटी है। 68 साल के राधाकृष्णन ओबीसी समुदाय कोंगु वेल्लार से आते हैं। खेलों के शौकीन राधाकृष्णन कॉलेज स्तर पर टेबल टेनिस के चैंपियन और लंबी दूरी के धावक थे। उन्हें क्रिकेट और वॉलीबॉल का भी शौक रहा है।
अब बात राधाकृष्णन की सियासी पारी की भी कर लेते हैं...
साल 1996 में उन्हें तमिलनाडु भाजपा का सचिव बनाया गया। 1998 के लोकसभा चुनाव में कोयंबटूर सीट से जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे। इस दौरान संसद में टेक्सटाइल पर स्थायी समिति के सदस्य रहे। 1999 के चुनाव में फिर से कोयंबटूर सीट पर जीत का परचम लहराया। ये पीएसयू समिति, वित्त पर परामर्श समिति और शेयर बाजार घोटाले की जांच करने वाली विशेष समिति के सदस्य भी रहे। साल 2004 में राधाकृष्णन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को भारतीय संसदीय दल के हिस्से के रूप में संबोधित भी किया। राधाकृष्णन ताइवान जाने वाले पहले संसदीय प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा थे।
2004 से 2007 के दौरान वे तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष रहे। इस दौरान 93 दिन में 19,000 किलोमीटर की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान सभी नदियों को जोड़ने, समान नागरिक संहिता, शैक्षणिक पर्यटन जैसे मुद्दे उन्होंने उठाए। छुआछूत के खिलाफ अपने काम के लिए जाने वाले सीपी राधाकृष्णन ने इस यात्रा के दौरान भी छुआछूत खत्म करने का भी मुद्दा उठाया। माना जाता है इस यात्रा से इनका राजनीतिक कद और बढ़ गया था। इसके अलावा उन्होंने दो पदयात्राएं भी कीं। 2016 से 2020 तक वे कोचीन स्थित कोयर बोर्ड के अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व में कोयर निर्यात 2532 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर पहुंचा। 2020 से 2022 तक वे भाजपा के ऑल इंडिया प्रभारी रहे और उन्हें केरल का जिम्मा सौंपा गया।
सियासी के बाद अब बात संवैधानिक जिम्मेदारियों की भी कर लेते हैं...
18 फरवरी 2023 को उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया। उन्होंने मात्र चार महीने में राज्य के सभी 24 जिलों का दौरा किया और जनता व प्रशासन से सीधे संवाद किया। 31 जुलाई 2024 को उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल बनाया गया। इसी बीच साल 2024 में इन्हें तेलंगाना का भी राज्यपाल बनाया गया था। इतना ही नहीं, ये पुड्डुचेरी के उपराज्यपाल भी बनाए जा चुके हैं। 17 अगस्त 2025 को उन्हें देश के उप-राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए का उम्मीदवार बनाया गया।
पीएम मोदी के साथ सीपी राधाकृष्णन
- फोटो : एक्स/सीपी राधाकृ्ष्णन
अब सवाल ये है कि आखिर BJP ने सीपी राधाकृष्णन को क्यों चुना?
सीपी राधाकृष्णन के नाम का एलान सिर्फ उनकी आरएसएस और भाजपा में लंबी पारी का नतीजा नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु और दक्षिण के राज्यों में भाजपा की पैठ बढ़ाने का एक नए प्रयास का संकेत माना जा रहा है। भाजपा तमिनाडु में अपना जनाधार बढ़ाने की लंबे समय से कोशिश कर रही है। नौ महीने के भीतर चुनाव होने हैं।
उपराष्ट्रपति चुनाव में सीपी राधाकृष्णन और बी. सुदर्शन रेड्डी के बीच मुकाबला
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कौन तय करेगा अगला उपराष्ट्रपति?
उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक मंडल यानी इलेक्टोरल कॉलेज के जरिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से होता है। संसद के दोनों सदनों के सदस्य इसमें हिस्सा लेते हैं। राष्ट्रपति चुनाव में निर्वाचित सांसदों के साथ-साथ विधायक भी मतदान करते हैं, लेकिन उपराष्ट्रपति चुनाव में केवल लोकसभा और राज्यसभा के सांसद ही वोट डाल सकते हैं। राज्यसभा के मनोनीत सांसदों को भी वोट डालने का अधिकार दिया गया है। राज्यसभा में फिलहाल 12 मनोनीत सदस्य हैं।
फिलहाल लोकसभा में पूर्ण संख्याबल 543 से एक सांसद कम हैं। यानी लोकसभा में फिलहाल 542 सांसद हैं। बशीरहाट सीट के सांसद के निधन के बाद से इस सीट पर उपचुनाव नहीं हो पाया है। ऐसे में लोकसभा से उपराष्ट्रपति चुनाव में 542 सांसद ही वोट करेंगे।
दूसरी तरफ, राज्यसभा में पूर्ण संख्याबल- 245 सांसदों के मुकाबले फिलहाल 239 सांसद हैं। इनमें 12 नामित सांसदों की संख्या पूरी है, लेकिन निर्वाचित सांसदों के लिए तय छह सीटें खाली हैं। इनमें से चार जम्मू-कश्मीर से हैं और एक पंजाब से, जहां आम आदमी पार्टी के संजीव अरोड़ा ने हाल ही में विधानसभा उपचुनाव जीतने के बाद इस्तीफा दे दिया था। वहीं, झारखंड से झामुमो के शिबू सोरेन का निधन इसी महीने 4 अगस्त हुआ है। फिलहाल खाली राज्यसभा सीटों को भरने के लिए उपचुनाव भी नहीं होने हैं। ऐसे में उपराष्ट्रपति चुनाव में राज्यसभा के 227 निर्वाचित सांसद और 12 मनोनीत सांसदों समेत कुल 239 सांसद ही वोट डालेंगे। यानी कुल मिलाकर 22 अगस्त को जब उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए वोटिंग होगी, तो इसमें 781 सांसद वोट डालने के अधिकारी होंगे। गौरतलब है कि दोनों सदनों का पूर्ण संख्याबल 788 है।
चलते-चलते संख्या बल भी जान लीजिए, जो तय करेगा कि अगला उपराष्ट्रपति?
लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर वोटरों की संख्या 781 है। ऐसे में किसी भी उम्मीदवार को उपराष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए प्रथम वरीयता के 391 वोट चाहिए होंगे। हालांकि, अगर एक से ज्यादा उम्मीदवार रहते हैं और प्रथम वरीयता के वोटों में किसी को 392 वोट नहीं मिलते तो दूसरी वरीयता के वोटों को गिना जाएगा। इस लिहाज से विजेता का फैसला होगा। लोकसभा की 542 सीटों में से एनडीए के पास फिलहाल 293 सांसद हैं। इनमें अकेले भाजपा के पास 240 सांसद हैं। इसके बाद दो और पार्टियों- तेदेपा और जदयू के पास क्रमशः 16 और 12 सीटें हैं। वहीं, शिवसेना के पास सात और लोजपा के पास पांच सांसद हैं। इन पांच पार्टियों को ही मिला दें तो एनडीए बहुमत के आंकड़े के पार पहुंच जाता है। वहीं, छोटी-बड़ी सभी पार्टियों का साथ रहने पर 293 वोट एनडीए को मिलना तय हैं। राज्यसभा में अकेले भाजपा के 102 सांसद हैं। लोकसभा में एनडीए सासंदों और राज्यसभा के भाजपा सांसदों का आंकड़ा ही एनडीए के उम्मीदवार की जीत तय करने के लिए काफी है। इसके अलावा राज्यसभा में जदयू के चार, एनसीपी के तीन, टीडीपी के दो सांसदों के साथ जेडीएस, एनपीपी, रालोद जैसे एक सांसदों वाले दल भी एनडीए का हिस्सा हैं। सात मनोनीत सांसद भी अगर एनडीए उम्मीदवार को वोट करते हैं तो ये जीत का अंतर बढ़ सकता है।