बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की एनडीए दलों की बैठक में उपस्थिति काफी अहम मानी जा रही है। क्योंकि चुनाव के बाद से ही नीतीश कुमार के बयानों के अलग-अलग मतलब निकाले जा रहे हैं। आशंका इस बात की भी जताई जाने लगी कि वे अब एक बार फिर पाला बदलने की सोच रहे हैं।
जेडीयू के पदाधिकारी ने नीतीश को प्रधानमंत्री बनाने की मांग कर भाजपा को असहज कर दिया था। इस बयान ने जेडीयू की महत्त्वाकांक्षा को रेखांकित कर दिया था। इतना ही नहीं, दिल्ली में एनडीए की बैठक के लिए आने के समय नीतीश कुमार ने भी बिहार के लिए विशेष राज्य की मांग कर भाजपा को मुश्किल में डाल दिया है।
अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर पहले ही सरकार के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। उसके अपने चुनावी वायदों को जमीन पर उतारने के साथ-साथ आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने के लिए उसे भारी मात्रा में पैसा आधारभूत ढांचे को मजबूत करने में लगाना होगा। ऐसे में किसी राज्य के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग पूरी करना उसके लिए टेढ़ी खीर होगी।
यहीं इस बात को भी समझ लेना चाहिए कि अगर भाजपा अकेले दम पर पूर्ण बहुमत पाने में असफल रह जाती है तो सरकार चलाने के लिए एनडीए के सहयोगी दलों पर उसकी निर्भरता बढ़ जाएगी। ऐसी स्थिति में उसकी मांगें भाजपा के लिए मुसीबत का कारण बन सकती हैं।
अगर सरकार चलाने के लिए भाजपा को बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस या टीआरएस जैसे दलों को साथ लाने की जरुरत पड़ती है तो इस स्थिति में यह समस्या और बढ़ सकती है क्योंकि विशेष राज्य का मुद्दा इन सभी दलों की स्थानीय राजनीति को प्रभावित करता है।
भाजपा के सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना समय-समय पर उसके लिए मुश्किलें खड़ी करती रही है। उद्धव ठाकरे समय-समय पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तारीफ में कसीदे पढ़ते रहे हैं। ऐसे में अगर भाजपा बहुमत से पीछे रह जाती है तो शिवसेना की भूमिका क्या होगी, यह देखने वाली बात होगी।
शिवसेना प्रमुख इस समय विदेश यात्रा पर थे। संभावना जताई जा रही थी कि शायद वे इस डिनर कार्यक्रम में न पहुंच सकें। लेकिन मंगलवार सुबह ही वे वापस आए और शाम तक डिनर कार्यक्रम में शामिल हुए। मतगणना के पूर्व एनडीए के डिनर में शामिल होकर उन्होंने भाजपा को फौरी तौर पर राहत की सांस जरूर दे दी है।