फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

एनडीए के लिए किसी सूरत में आसान नहीं होगा लोजपा से किनारा कर पाना

Sun, 27 Sep 2020 06:17 AM IST
Jeet Kumar हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली
विज्ञापन
चिराग पासवान साथ नीतीश कुमार - फोटो : amar ujala
विज्ञापन

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में सहयोगियों के बीच सीटों के बंटवारे की गुत्थी अब तक उलझी है। खासतौर से सहयोगी लोग जनशक्ति पार्टी फिलहाल जदयू और भाजपा के लिए सिरदर्द है।

विज्ञापन


जदयू अध्यक्ष और बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने तो लोजपा से सीधे सीधे पल्ला झाड़ कर विवाद की गेंद भाजपा के पाले में डाल दी है। हालांकि राज्य का सियासी और  दलित वोट बैंक का गणित ऐसा है  कि जिसमें राजग के लिए लोजपा से किनारा करना आसान नहीं होगा।

चुनावी समीकरणों में एक दूसरे को मात देने के लिए एनडीए और विपक्षी महागठबंधन दोनों के निगाहें दलित बिरादरी पर हैं। इस बिरादरी के सियासी महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के मतदाताओं में इस वर्ग की हिस्सेदारी 16 फीसदी है।
विज्ञापन


एनडीए ने इसमें सेंधमारी के लिए इस बिरादरी के कद्दावर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी और श्याम रजक की जदयू में घर वापसी कराई है।

लोजपा अहम क्यों
लोजपा प्रमुख पासवान की दलित बिरादरी में अच्छी पैठ रही है। खराब परिस्थितियों में भी लोजपा को विधानसभा और लोकसभा चुनाव में औसतन छह से 11 फीसदी वोट हासिल होते रहे हैं।

अहम तथ्य यह है वर्तमान में पासवान बेहद अस्वस्थ हैं। इससे चिराग के प्रति हमदर्दी है। ऐसे में दलित बिरादरी में सहानुभूति का ज्वार पैदा हो सकता है। यदि रादग ने नाता तोड़ा तो दलितों की नाराजगी महंगी पड़ सकती है। 

क्यों है विवाद
दरअसल विवाद की जदयू और भाजपा की महत्वाकांक्षा है। जदयू हर हाल में राज्य की सियासत में बड़ा भाई बने रहना चाहता है। जबकि भाजपा इस चुनाव में महाराष्ट्र की तर्ज पर बड़ा भाई बनने की व्यापक संभावना देख रही है। 

भाजपा की कोशिश खुद और जदयू को सौ सौ की संख्या में बराबर सीटों पर लड़ने के लिए राजी करना है। ऐसे में बाकी बची 43 सीटों में से बड़ा हिस्सा लोजपा के खाते में जाएगा। ऐसे में अगर भाजपा जदयू से सीटें जीतीं तो गठबंधन में उसके बड़े भाई होने का दावा मजबूत होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें