इसी बीच 1942 में आजादी के आंदोलन में उनके पिताजी गिरफ्तार कर लिए गए। एनडी तिवारी थे तो बालक, लेकिन आंदोलन की बाल-टोली में सक्रिय थे। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय उनकी उम्र लगभग 14-15 वर्ष रही होगी। पिता-पुत्र बरेली जेल में बंद कर दिए गए।
छूटने के बाद उनमें आगे पढ़ने की इच्छा हुई। पर, आर्थिक कठिनाई। फिरोज गांधी को पत्र लिखा कि हमारी पारिवारिक आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, लेकिन पढ़ना चाहता हूं। फिरोज गांधी उस समय प्रयागराज के आनंद भवन में ही रहा करते थे और नेहरू परिवार की तरफ से स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय युवाओं की मदद करते थे। फिरोज गांधी ने जवाब में लिखा-यहीं आ जाओ। पढ़ाई हो जाएगी।
संयोग से उसी बीच तिवारी जी रिहा हो गए। वह अपने पिताजी से छिपाकर और मित्र से पांच रुपये उधार लेकर प्रयागराज पहुंच गए। फिरोज गांधी से मिले। पढ़ाई की तो व्यवस्था हो गई, लेकिन रहने का कोई इंतजाम नहीं। आनंद भवन के पीछे चपरासियों और वहां काम करने वाले नौकरों के क्वार्टर बने हुए थे।
उसमें रहने वाले एक रसोइए ने तिवारी जी से कहा कि वह उसके बच्चों को पढ़ा दिया करें तो वह एक वक्त का खाना खिला देगा। तिवारी जी की जिंदगी इस तरह आगे बढ़ी। वह रसोइए के बच्चों को पढ़ाते। शाम को एक वक्त खाना खाते। रात में क्वार्टर के पास लगे एक पेड़ के नीचे पड़े तख्त पर बगैर बिस्तर ही लेट जाते। जैसे-तैसे जीवन आगे बढ़ा और पढ़ाई भी। इसी तरह संघर्ष करते-करते वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचे। तिवारी जी पढ़ने में बहुत मेधावी थे। उन्होंने एमए और एलएलबी में टॉप किया।
- अच्युतानंद मिश्र