आपातकाल के दौरान तिवारी मुख्यमंत्री थे। एक तरफ से मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी, तो दूसरी पुराने मित्रों के प्रति संवेदनशीलता। तिवारी ने उस समय जेल में बंद अनेक लोगों के परिवारों की मदद की। पत्रकारों के साथ भी उनके काफी मधुर रिश्ते थे।
शायद यही वजह रही कि उत्तर प्रदेश में उस समय अखबारों पर वैसी कठोर सेंसरशिप नहीं थी, जैसी देश के दूसरे राज्यों में थी। उनके कार्यकाल में गरीबों व किसानों के लिए जितनी योजनाएं बनी, शायद ही किसी दूसरे मुख्यमंत्री के कार्यकाल में बनीं।
तिवारी जी रात में तो अचानक निरीक्षण कर ही लेते थे, तो अक्सर सुबह पांच बजे ही किसी न किसी जिले के जिलाधिकारी को फोन मिलाकर वहां की विकास की स्थिति और अन्य विषयों के बारे में फीडबैक लेते थे। विरोधी दलों के नेताओं से मधुर संबंध रहे। संक्षेप में कहें, तो वे सिर्फ राजनेता नहीं, बल्कि बहुत संवेदनशील भी थे।
तिवारी जी में आज के राजनेताओं की तरह न तो चालाकी थी और न स्वार्थ का भाव। उनके जीवन में कुछ विपरीत परिस्थितियां भी आईं, जिन्होंने उनके सार्वजनिक जीवन पर सवालिया निशान भी लगाए, लेकिन एक वाक्य में कहा जाए तो वह नेता कम, इंसान ज्यादा थे। जिनके लिए सियासत नहीं सरोकार ज्यादा महत्व रखते थे। फर्श पर जन्म लेकर अपनी योग्यता और संघर्षों से अर्श तक सफर करने वाले लोग बिरले ही होते हैं।