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नपुंसकता और बांझपन की शर्म लोगों को उकसा रही आत्महत्या के लिए, नासमझी में दे रहे जान

Fri, 04 Sep 2020 06:21 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) के डॉक्टर ओमप्रकाश कहते हैं, नासमझी में स्त्री-पुरुष जान दे रहे हैं। पुरुष प्रधान समाज में बहुत से लोग, जिन्हें मर्दानगी को लेकर शिकायत रहती है, वे यहां भी खुद का इलाज न करा कर स्त्री की परीक्षा लेने को आतुर रहते हैं...
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी 'एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड इन इंडिया' 2019 रिपोर्ट में एक हैरतंगेज खुलासा हुआ है। नपुंसकता और बांझपन से ग्रसित लोगों ने आत्महत्या के मामले में एड्स मरीजों को पीछे छोड़ दिया है। पिछले साल एड्स की बीमारी से पीड़ित 184 पुरुषों और 38 महिलाओं ने आत्महत्या जैसी खतरनाक राह चुनी। दूसरी ओर इस अवधि में 191 पुरुषों ने नपुंसकता के चलते जान दे दी।

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बांझपन की वजह से 237 महिलाएं आत्महत्या के मार्ग पर चली गईं। मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) के डॉक्टर ओमप्रकाश कहते हैं, नासमझी में स्त्री-पुरुष जान दे रहे हैं। पुरुष प्रधान समाज में बहुत से लोग, जिन्हें मर्दानगी को लेकर शिकायत रहती है, वे यहां भी खुद का इलाज न करा कर स्त्री की परीक्षा लेने को आतुर रहते हैं।

इस चक्कर में भीतर की बात जब समाज के बीच पहुंचती है तो वह स्त्री-पुरुष, दोनों के बीच कलह का कारण बन जाती है। परिवार और समाज से जब आवाजें आना शुरू होती हैं, तो ऐसे लोग आत्महत्या की तरफ चल पड़ते हैं।

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रिपोर्ट में आत्महत्या के इतने मामले सामने आए हैं...

शादी से संबंधित मामले: (दहेज)

पुरुष-   141
महिला- 1815

इनमें मध्यप्रदेश की 496, महाराष्ट्र की 158, यूपी की 436 और पश्चिम बंगाल में 288 महिलाएं शामिल हैं।

एक्सट्रा मेरिटल अफेयर:

पुरुष-    674
महिला-  440

तलाक के मामलों में:

पुरुष-    262  
महिला-  278

शादी से जुड़े अन्य मामले:

पुरुष-    1011
महिला-  643

परीक्षा में फेल होने वाले:

पुरुष-   1578
महिला-  1166

पारिवारिक समस्या:

पुरुष-    30110
महिला-  15025

कैंसर के कारण:

पुरुष-    857
महिला-  317

मानसिक रोगी:

पुरुष-    7734
महिला-  3272

अपनों की मौत होने पर:

पुरुष-    791
महिला-  395

सामाजिक प्रतिष्ठा की खातिर:

पुरुष-    425
महिला-  135

लव अफेयर:

पुरुष-     3674
महिला-   2637

संदिग्ध एवं अवैध संबंध:

पुरुष-     442
महिला-   255

नाजायज गर्भावस्था:

महिला-   16

रेप जैसे मामलों में:

पुरुष-     81
महिला-   72
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मर्दानगी पर चोट लगने के बावजूद बैकफुट पर नहीं आना चाहता पुरुष

मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) के डॉक्टर ओमप्रकाश ने कहा, चूंकि हमारे यहां अभी पुरुष प्रधान वाली मानसिकता है, इसलिए जब कभी व्यक्ति के पौरुष पर चोट लगती है, तो वह बैकफुट पर आना ठीक नहीं समझता। वह कुंठाग्रस्त रहने लगता है। अपनी गलती को छिपाकर स्त्री को कसूरवार ठहराने का प्रयास करता है। एक स्थिति ऐसी भी आती है जब वे दोनों यह सोचने लगते हैं कि हमारा तो जीना ही व्यर्थ हो गया है।

यह जरूरी नहीं है कि ये स्थिति डिप्रेशन या दूसरी किसी बीमारी की वजह से आती हो। ये भाव सामान्य व्यक्ति में भी आ सकते हैं। व्यक्ति मन ही मन यह सोचने लगता है कि उसे गुप्त रोग हो गया है। उसे सड़क पर जो विज्ञापन दिखते हैं कि यहां गुप्त रोगों का इलाज होता है, वह सब उसे गलत भावों की ओर ले जाता है। वह सोचता है कि अगर किसी को पता लग गया, तो मैं खत्म हो जाउंगा।

कई मामले ऐसे होते हैं जिनमें पुरुष सीधे स्त्री पर आरोप लगा देता है। बच्चे न होने के पीछे वह स्त्री को कसूरवार ठहराने लगता है। समस्या पुरुष के साथ होती है, मगर वह जांच स्त्री की कराता है। कई बार बिना जांच के ही स्त्री को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। घर-परिवार में वह पुरुष ही यह बात फैलाता है कि पत्नी का इलाज चल रहा है।

डॉ. ओमप्रकाश आगे बताते हैं कि पुरुष प्रधान समाज होने के कारण कोई उस व्यक्ति से सवाल जवाब नहीं करता। ऐसे मामलों में स्त्री और पुरुष, दोनों को आपसी समझदारी से काम लेना चाहिए। जब उन्हें अपनी कमी का पता लगे तो बिना किसी देरी के डॉक्टर के पास चले जाएं।

बहुत से ऐसे कारण हैं जो जानकारी के अभाव में पुरुष और स्त्री को पता ही नहीं लगते। इस मामले में सेक्स शिक्षा के प्रति दूरी बनाना भी नुकसानदायक साबित होता है। विभिन्न भ्रांतियों और विज्ञापनों के चक्कर में नहीं फंसना चाहिए। अपनी कमियां डॉक्टर को बता कर अगर समय रहते इलाज हो जाता है, तो आत्महत्या जैसे घातक कदम को रोका जा सकता है।
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