माता-पिता के संक्रमित होने व कोविड-19 आइसोलेशन वार्ड में अकेलेपन का सामना कर चुके बच्चों का व्यवहार आक्रामक हो रहा है। ऐसे बच्चे व माता-पिता अब सरकारी हेल्प लाइन पर मदद के लिए पहुंच रहे हैं। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) टोल-फ्री हेल्पलाइन ‘संवेदना’ के जरिये ऐसे लोगों को टेली परामर्श दे रहा है। अब तक एक हजार से ज्यादा लोग इसका लाभ उठा चुके हैं।
महामारी के दौरान प्रभावित बच्चों को मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा और भावनात्मक सहयोग देने के उद्देश्य से एनसीपीसीआर ने एक टोल-फ्री हेल्पलाइन ‘संवेदना’ को सितंबर 2020 में शुरू किया है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार इसके जरिये सितंबर 2020 से 7 मई 2021 के बीच में ऐसी 1009 शिकायतों का निवारण किया गया। यह हेल्पलाइन पूरे भारत में तमिल, तेलगु, कन्नड़, उड़िया, मराठी, गुजराती, बंगाली, जैसी विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में बच्चों की मदद करती है।
ऐसी आ रही शिकायतें
औरंगाबाद के एक कोविड-19 आइसोलेशन सेंटर में आए एक मामले में 15 वर्षीय एक बच्ची ने ज्यादा संख्या में भाई बहनों के कारण माता-पिता से पर्याप्त प्यार न मिलने पर निराशा जताई। उसने माता-पिता से अपनी जल्दी शादी करवाने के लिए दबाव बनाया। काउंसलर ने परिवार को सलाह दी कि उसे पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित करें।
कानपुर के एक अन्य मामले में संक्रमित होकर आइसोलेशन सेंटर में रह चुके छह वर्षीय एक बच्चे के माता-पिता ने उसके आक्रामक व्यवहार के लिए फोन किया। काउंसलर ने बताया कि बच्चा तन्हा महसूस कर रहा है। उन्हें सलाह दी कि बच्चे को खिलौने से खेलने, कहानियां सुनने जैसी गतिविधियों में व्यस्त रखें। वहीं मध्य प्रदेश के सिंगरौली के एक मामले में 17 वर्षीय बच्चे ने खुद फोन तन्हा महसूस करने की बात कही। काउंसलर ने उसकी भी मदद की।
टोल-फ्री नंबर पर फोन कर ले सकते हैं परामर्श
यह टेली-परामर्श सेवा टोल-फ्री नंबर 1800-121-2830 पर सोमवार से शनिवार तक सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक और दोपहर 3 बजे से रात 8 बजे तक उपलब्ध है।
तीन श्रेणियों के तहत दिया जाता है परामर्श
जब कोई बच्चा/केयरटेकर/माता-पिता ‘संवेदना’ पर फोन करते हैं तो उनसे सुरक्षित वातावरण में एक पेशेवर परामर्शदाता बात करता है। इसमें तीन श्रेणियों के तहत बच्चों को टेली-परामर्श दिया जाता है। पहली श्रेणी में वह बच्चे आते हैं, जो क्वारंटीन/आइसोलेशन/कोविड देखभाल केंद्रों में हैं। दूसरी श्रेणी में वे जिनके माता-पिता या परिवार के सदस्य संक्रमित हैं। तीसरी श्रेणी में वे बच्चे हैं जिन्होंने महामारी के कारण अपने माता-पिता को खो दिया है।