शरद पवार का पेट दर्द और राजनीति में भूचाल!
शरद पवार राजनीति में अपनी शैली के शिल्पकार हैं। जरूरत से ज्यादा नहीं बोलते। हाजमा बहुत दुरुस्त है। देश के मौजूदा हर राजनीतिक दल के प्रमुख नेताओं में अपना वजन रखते हैं। उनके अचानक अस्पताल में भर्ती हो जाने की बात भी कांग्रेस पार्टी के महाराष्ट्र के बड़े नेताओं को भी समझ में नहीं आई। पवार के अस्पताल में भर्ती होने के बाद गृहमंत्री से मुलाकात को लेकर उनकी तरफ से कुछ नहीं कहा गया। प्रफुल्ल पटेल भी पवार के बड़े राजदार हैं और उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। प्रधानमंत्री ने पवार का हालचाल लिया तो राजनीतिक संदेह और चर्चा को थोड़ी और गुंजाइश मिल गई।
पवार के स्वास्थ्य के बारे में सांसद सुप्रिया सुले के सचिवालय से दो जानकारियां मिलीं। पहली तो यह कि पवार साहब 80 साल के हो गए हैं। उन्हें पेट में कभी-कभी दर्द उठता था और इसके इलाज के लिए उनका अस्पताल जाना पहले से तय था। कहा यह भी गया कि पवार खून पतला करने की दवा भी लेते हैं, उम्रदराज हैं, इसलिए थोड़ा बहुत स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं रहती हैं।
दूसरी जानकारी यह मिली कि रविवार (28 मार्च) को अचानक पवार के पेट में दर्द हुआ, उन्हें ब्रीच कैंडी ले जाया। चिकित्सकों ने जांच की और गॉल ब्लैडर में शिकायत मिली है, सर्जरी संभव है। एनसीपी का कोई दूसरा नेता इस बारे में कुछ नहीं बोल रहा है। सुशील कुमार शिंदे या पृथ्वीराज चव्हाण जैसे नेता भी पूरे प्रकरण पर अभी शांत हैं। शिवसेना के एक सांसद और बयान देने वाले नेता ने भी कहा कि थोड़ा रुकना चाहिए। पवार साहब को समझना बहुत आसान नहीं है।
हाई-प्रोफाइल मीटिंग थी?
शरद पवार राजनीति में कुछ करते हैं, तो उसके पहले उनका पूरा होमवर्क रहता है। सूचनाओं पर पूरा नियंत्रण बनाने में सफल हो जाते हैं। हालांकि एकाध बार उनकी गणना में चूक भी हुई है। जैसे वह नहीं समझ पाए थे कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भेंट करके उनके मुंबई पहुंचने से पहले क्या हो जाएगा? इस बार भी उद्योगपति मुकेश अंबानी के आवास एंटीलिया के बाहर स्कार्पियो में विस्फोटक, धमकी भरा पत्र मिलने तथा महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आने के बाद पवार ने पहले गृहमंत्री अनिल देशमुख के इस्तीफे को लेकर उड़ती राजनीतिक धूल पर काबू पाया। इसके बाद अमित शाह से मीटिंग का रोड-मैप तैयार हुआ।
गौतम आडानी से भी पवार के पहले से अच्छे रिश्ते हैं, और एक निजी जेट में हवाई यात्रा करके वह अहमदाबाद पहुंचे, मीटिंग की। कुछ घंटे में लौट आए। पवार अहमदाबाद में मिलने तब गए थे, जब शिवसेना के मुखपत्र सामना में अनिल देशमुख और उनके गृह मंत्रालय के कामकाज को लेकर निशाना साधा गया था। शिवसेना अपने मुखपत्र के जरिए इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की छवि को बचाने के प्रयास में लगी थी। वैसे भी इस प्रकरण पर इन दिनों उद्धव ठाकरे मौन हैं। कांग्रेस पार्टी का भी कोई बड़ा नेता कुछ नहीं बोल रहा है।
'राहु-केतु' की सियासी दशा ढूंढ रहे हैं राजनीति के पंडित
कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व महासचिव का कहना है कि इस तरह की घटना पर वह कभी कुछ नहीं बोलते। बस इतना जान लीजिए कि शरद पवार और उनकी राजनीति को समझना बहुत आसान नहीं है। क्या महाराष्ट्र की सरकार पर 'राहु और केतु' की कोई सियासी दशा चल रही है? सूत्र का कहना है कि चार दशक से अधिक समय की राजनीतिक यात्रा में वह जितना शरद पवार को समझ पाए हैं, महाराष्ट्र में अभी सरकार के लिए संकट जैसा कुछ नहीं होने वाला है। भविष्य में क्या होगा, कहना मुश्किल है।
सूत्र का कहना है कि भतीजे अजित पवार के बगावत करके भाजपा के साथ जाने के समय ही वह शिवसेना का साथ छोड़ सकते थे। तब शरद पवार ने ऐसा नहीं किया, तो ऐसे समय वह शिवसेना और कांग्रेस का साथ छोड़कर अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता को दागदार नहीं बनाना चाहेंगे। लेकिन अगर उन्होंने भेंट की है तो कुछ सोच-समझकर निर्णय लिया होगा।
क्या सच में शरद पवार को समझना मुश्किल है?
शरद पवार की उम्र करीब 80 साल की है। 60 के दशक में ही उन्होंने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री यशवंत राव चव्हाण को प्रभावित करने में सफलता पाई थी। 1967 में पहली बार बारामती से विधायक बने थे। तब से राजनीति में शरद पवार ने खूब उतार-चढ़ाव देखा, लेकिन कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पवार के मार्ग दर्शकों में वसंत दादा पाटील भी थे। 1978 में वसंत दादा पाटील मुख्यमंत्री और पवार उनके मंत्रिमंडल के सदस्य बने। 18 जुलाई 1978 शरद पवार ने 12 विधायकों को साथ लेकर बगावत की और राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। इसे वसंत दादा पाटील ने पवार द्वारा अपनी पीठ में छुरा भोंकना कहा था। राजनीति में शरद पवार का यह पहला जैकपॉट था। इसके बाद शरद पवार ने महाराष्ट्र की राजनीति में अपने कद को स्थापित किया। वह आज भी महाराष्ट्र में मराठा राजनीति के सरदार के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में अपने बूते पर अपना अलग स्थान रखते हैं।
एक तीर से कई निशाने
पवार को 1980 के दशक से जानने वाले एक पूर्व राज्यपाल का कहना है कि एनसीपी नेता कभी किसी से संबंध बिगाड़कर नहीं रखते। सूत्र का कहना है कि आपको याद होगा, उन्होंने शिवसेना, कांग्रेस के साथ उद्धव ठाकरे से सरकार बनाने के पहले संसद भवन में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी। शरद पवार की इस मुलाकात ने कांग्रेस और शिवसेना दोनों को हैरत में डाल दिया था, लेकिन आखिरकार सरकार तो कांग्रेस, शिवसेना, एनसीपी की ही बनी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता का कहना है कि शरद पवार और प्रधानमंत्री मोदी के बीच में पहले से निजी तौर पर अच्छे संबंध हैं। यह पवार का स्वभाव है कि वह संबंधों में एक न्यूनतम गुंजाइश बनाए रखते हैं। समझा जा रहा है कि शरद पवार ने अहमदाबाद में भेंट के जरिए भी कुछ इसी तरह का संदेश दिया है। वह जहां कांग्रेस और शिवसेना को संदेश दे रहे हैं, वहीं महाराष्ट्र भाजपा के नेता और केन्द्र के नेताओं को भी एक पैगाम दे रहे हैं।