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एनसीबी: अंतर-राज्यीय फार्मास्युटिकल ड्रग डायवर्जन केस, ₹20.10 करोड़ की संपत्तियों को फ्रीज करने की राह साफ

Sun, 01 Nov 2026 06:00 PM IST
पवन पांडेय डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
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एनसीबी - फोटो : ANI
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नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने एक अंतर-राज्यीय फार्मास्युटिकल ड्रग डायवर्जन मामले में 25 अचल संपत्तियों को फ्रीज करने के अपने आदेश की पुष्टि प्राप्त कर ली है। इन संपत्तियों का कुल निवेश मूल्य ₹20,10,51,211 (लगभग ₹20.10 करोड़) है। नई दिल्ली स्थित एसएएफईएम (एफओपी) और एनडीपीएस अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी ने, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) अधिनियम, 1985 की धारा 68एएफ(2) के तहत शनिवार को एक आदेश जारी किया है। इस आदेश के माध्यम से, एनसीबी द्वारा दो अक्टूबर को अंतर-राज्यीय फार्मा डायवर्जन मामले की जांच के दौरान जारी किए गए फ्रीजिंग आदेश की पुष्टि की गई।
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ड्रग तस्करी से प्राप्त आय का पता लगाना
वित्तीय जांच से पता चला कि डायवर्ट की गई दवाओं की बिक्री से प्राप्त रकम को जांच के दायरे में आईं फर्मों के बैंक खातों के जरिए घुमाया गया। उस कमाई को कई स्तरों से गुजारा गया। आरोपी अपने और अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर मौजूद संपत्तियों के लिए आय का कोई वैध स्रोत साबित करने में विफल रहे। इन 25 संपत्तियों में औद्योगिक प्लॉट, कमर्शियल यूनिट, दुकान-सह-कार्यालय यूनिट और आवासीय अपार्टमेंट शामिल हैं। 

अब लेन-देन करना प्रतिबंधित
इनमें गिलको इंडस्ट्रियल पार्क, मोहाली सिटी सेंटर-3, मोहाली सिटी सेंटर वॉक, जनता इंडस्ट्रियल एस्टेट, गैलेक्सी हाइट्स-2 और क्वीन्सटाउन जैसी जगहों पर स्थित संपत्तियां शामिल हैं। संपत्तियों को फ्रीज करने की इस पुष्टि के बाद, बिना पूर्व अनुमति के इन्हें किसी और को हस्तांतरित करना या इनसे जुड़ा कोई अन्य लेन-देन करना प्रतिबंधित हो गया है। इससे एनडीपीएस अधिनियम के अध्याय वीए के तहत होने वाली कानूनी कार्यवाही के लिए इन संपत्तियों को सुरक्षित रखा जा सकेगा।
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नेटवर्क व वित्तीय सहायता तंत्र को निशाना बनाना
यह कार्रवाई एनसीबी के 'नेटवर्क-केंद्रित' दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें ड्रग सप्लाई चेन की जांच के साथ-साथ वित्तीय जांच भी की जाती है। दवाओं की हेराफेरी और उनकी बिक्री से मिलने वाली रकम का पता लगाकर, एनसीबी अवैध तस्करी में शामिल निर्माताओं, वितरकों, आयोजकों, फर्जी इकाइयों और वित्तीय मदद पहुंचाने वालों की पहचान करती है और उनके खिलाफ कार्रवाई करती है। अवैध रूप से अर्जित संपत्तियों के खिलाफ कार्रवाई करने से उस वित्तीय तंत्र को नुकसान पहुंचता है, जो ऐसे नेटवर्कों को बनाए रखता है। इससे तस्करों की ड्रग्स से हुई कमाई को फिर से तस्करी में लगाने की क्षमता भी सीमित हो जाती है।

जब्ती से लेकर अंतर-राज्यीय नेटवर्क तक
इस मामले की शुरुआत 7 फरवरी 2025 को अमृतसर में 5,000 ट्रामाडोल टैबलेट की जब्ती से हुई। पैकेजिंग से पता चला कि इनका निर्माण हरिद्वार की जेआर फार्मास्यूटिकल्स' ने किया था और देहरादून की तिवारी मेडिकल एजेंसीज' इनकी मार्केटर (विपणनकर्ता) थी। जांच में सामने आया कि मार्केटर के रूप में बताई गई यह फर्म असल में मौजूद ही नहीं थी। एनसीबी द्वारा गठित एक विशेष जांच दल ने सप्लाई चेन का पीछा किया, जिससे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में फैली दवा कंपनियों के एक ऐसे अंतर-राज्यीय नेटवर्क का पता चला, जो दवाओं को फर्जी इकाइयों को भेजकर उनकी अवैध तस्करी कर रहे थे।

जब्ती और गिरफ्तारियां
इस मामले की जांच में अब तक लगभग 34 लाख साइकोट्रोपिक गोलियां, कोडीन-युक्त कफ सिरप की 10.57 लाख बोतलें, 50,000 ट्रामाडोल एम्प्यूल, 5,000 मिडाज़ोलम शीशियां और लगभग 2,200 किलोग्राम साइकोट्रोपिक पाउडर (जिसमें कच्चा माल और तैयार उत्पाद शामिल हैं) जब्त किए गए हैं। इस मामले में 17 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। जांच में पता चला है कि यह नेटवर्क सात राज्यों - पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, हरियाणा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ है।

अग्रिम जमानत की याचिकाएं हुई खारिज
हिमाचल प्रदेश के काला-अंब स्थित 'मैसर्स डिजिटल विजन' और 'मैसर्स वेलिंगटन हेल्थकेयर' से भारी मात्रा में साइकोट्रोपिक दवाएं और कच्चा माल जब्त किया गया है। हरियाणा के अंबाला कैंट के रहने वाले कोनिक गोयल, मानिक गोयल और उनके पिता पुरुषोत्तम लाल गोयल, बार-बार समन और गैर-जमानती वारंट जारी होने के बावजूद अभी भी फरार हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अग्रिम जमानत की याचिकाओं को खारिज कर दिया है। उनकी और उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर मौजूद संपत्तियों को फ्रीज (जब्त) कर दिया गया है।
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