उसने न कौम को आड़े आने दिया और न ही इलाकाई संबंधों को। यहां तक कि भ्रष्ट अफसरों ने दहशतगर्दी का आरोप तक लगाकर इस कश्मीरी युवक को दबाने की कोशिश की। अपनी ही कौम के लोगों ने धमकाया-बरगलाया लेकिन यह आठवीं पास युवक नजीर अहमद लोन नहीं रुका।
कश्मीर घाटी के गांव से आरटीआई लगाई और खोलता चला गया अपनी ही कौम के अफसरों की पोल। इसी वजह से जम्मू व कश्मीर प्रदेश का यह युवक आरटीआई नजीर के नाम से पहचाना जाता है। शॉल बेचकर अपने परिवार की गुजर-बसर करने वाले नजीर बताते हैं कि बाहर के दुश्मनों से लड़ना कई बार आसान होता है लेकिन अपने ही लोगों से लड़ना बहुत कठिन होता है।
नजीर का गांव खां शिगलीपुरा (जिला-बड़गाम) श्रीनगर से करीब 40 किमी दूर है। फरवरी से अक्टूबर तक (आठ माह) नजीर गांव में रहकर परिवार संग शॉल पर कढ़ाई करते हैं और नवंबर से फरवरी (चार माह) तक दिल्ली में शॉल बेचते हैं। इन चार माह में 18 से 20 हजार रुपए कमाकर गर्मी शुरू होने के पहले वह अपने गांव लौट जाते हैं। इन्हीं पैसों से इनके बाकी के आठ महीने आराम से गुजर जाते हैं।