बता दें कि केंद्रीय गृह मंत्री ने गत दिनों सुरक्षा बलों की एक बैठक में कहा था कि नक्सली अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। नक्सली हिंसा की घटनाओं में लगातार कमी हो रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय में एलडब्लूई मामलों के वरिष्ठ सलाहकार और पूर्व आईपीएस के.विजय कुमार एवं दूसरे अधिकारी लंबे समय से इस ऑपरेशन की तैयारी में जुटे थे। वे केवल पतझड़ शुरु होने का इंतजार कर रहे थे। छत्तीसगढ़ में कई जगहों पर ऐसे जंगल हैं, जहां दिन में भी कुछ नहीं दिखाई देता। जब पेड़ों के पत्ते झड़ने लगते हैं तो ही सुरक्षा बल, नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन शुरु करते हैं।
केंद्रीय सुरक्षा बल के अधिकारी बताते हैं, इस घटना में शामिल जवानों को 'खुफिया' सूचना से कोई फायदा नहीं मिला। चूंकि सुरक्षा बलों की सभी टीमें अलग-अलग चल रही थी। उनके बीच की दूरी ज्यादा थी, इसलिए नक्सलियों ने आसानी ने एक टीम को घेर लिया।
खास बात ये है कि नक्सलियों को इस ऑपरेशन की जानकारी थी। वे जानते थे कि कहां पर कितने जवानों की टीमें चल रही हैं। उन्हें यह भी मालूम था कि सुरक्षा बलों की टीमों के बीच कितना अंतराल था। यानी एक टीम पर हमला होता है तो दूसरी टीम को वहां तक पहुंचने में कितना समय लगेगा, नक्सलियों ने ये होमवर्क कर लिया था। कई टीम तो ऐसी थी, जिनके बीच पांच से सात किलोमीटर दूरी का फासला रहा है। मैदानी इलाके की बात अलग है। पहाड़ पर दो किलोमीटर की दूरी तय करने में कई घंटे लग जाते हैं। इस हमले में भी वही हुआ है। अगर सुरक्षा बलों की कोई एक टीम वहां समय रहते पहुंच जाती तो कई जवानों को बचाया जा सकता था।
जवानों के शवों के पास पड़े हथियार, गोला-बारुद और संचार उपकरण नक्सलियों के हाथ नहीं लगते। चूंकि हमले के बाद दूसरी टीम उस प्वाइंट तक नहीं पहुंच सकी, इसलिए नक्सलियों ने सुरक्षा बलों के हथियार, जिनमें एके-47 जैसी स्वचालित राइफल शामिल हैं, उन्हें लूट ले गए। जिस जगह पर जवानों के शव बरामद हुए थे, वहां उनके शरीर के अलावा कुछ नहीं बचा था।