देश में नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन करीब है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो जाएगा। माओवादियों के आत्मसमर्पण की खबरें आ रही हैं तो कई जगहों पर मुठभेड़ में नक्सली मारे जा रहे हैं। इनमें 30-40 वर्षों से भूमिगत रहे बहुरूपिये नक्सली शामिल हैं जिनका न कोई फोटो था और न ही कोई दूसरी पहचान। यही वजह है, शीर्ष नक्सलियों तक पहुंचने में सुरक्षा बलों को काफी मशक्कत करनी पड़ी। सुरक्षा बलों को भ्रमित करने के लिए नक्सलियों ने हर तरीका आजमाया।
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नक्सलियों के समूह में कई तरह के कैडर होते थे। पॉलिसी वर्क, खुफिया सूचनाएं जुटाने, आर्थिक तंत्र, सप्लाई चेन, सुरक्षा बलों को घेरकर हमला करने वाला गुरिल्ला दस्ता और आईईडी विस्फोट के जरिए नुकसान पहुंचाना, ये काम अलग-अलग कैडर को सौंपे जाते थे। इनमें से पॉलिसी वर्क और हमले का आदेश देने वाला कैडर, सर्वोच्च था। ये लोग सामने नहीं आते थे। फोन का इस्तेमाल नहीं करते थे। संदेश पहुंचाने के लिए पेनड्राइव होती थी। इसे खुफिया इकाई के लोग संबंधित नेतृत्व तक पहुंचाते थे। शुरुआत में पुलिस इन सबसे बेखबर थी।
आठ से दस रखते थे नाम
शीर्ष नक्सली आठ से दस नाम रखते थे। अगर कोई एक बड़ा माओवादी नेता दूसरे राज्य में पहुंचता तो वहां उसका नाम बदल जाता था। इंटरनल कमेटी की बैठकों में भी अलग नाम रहता था। ये बहुरूपिये नक्सली, इंटर स्टेट बॉर्डर या घने जंगल के आखिरी कैंप पर ठहरते थे। 2010 के बाद सुरक्षा बलों ने इन क्षेत्रों में एक मजबूत खुफिया तंत्र स्थापित किया। पहले गांव, उसके बाद कमेटी स्तर पर और फिर प्लाटून/एरिया कमांडरों की सूचनाएं एकत्रित की गई। मुठभेड़ में बड़ा नेता मारा जाता तो उसका सही नाम पता नहीं लगता था। कुख्यात नक्सली माडवी हिडमा के मारे जाने की खबरें आती रहती थी। बाद में पता चलता कि खबर सही नहीं है।
जब डाटा बेस तैयार हुआ
स्थानीय पुलिस, विशेष दस्ते और केंद्रीय बलों की खुफिया इकाइयों के बीच समन्वय बना तो सूचनाएं आने लगी। बड़े नक्सलियों/कमांडरों का डाटा बेस तैयार हुआ। जो नक्सली पकड़े जाते, उनसे पूछताछ में कई बातें पता चली। आंधप्रदेश के नक्सली, छत्तीसगढ़ या झारखंड में कौन सा नाम रखते हैं। दूसरे राज्य में अन्य नाम से एक्टिव होना, पुलिस को कन्फ्यूज करने का तरीका, उनकी तकनीक और बाहरी दुनिया से संपर्क, ये सब पता लगने लगा। जब नक्सलियों ने मीडिया में एंट्री की तो सुरक्षा बलों की राह आसान हो गई। उनकी सभाओं के फोटो आने लगे। जब कोई नक्सली सरेंडर करता तो उससे अहम जानकारी मिल जाती थी।
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तीन-चार दशकों तक रहे भूमिगत
शीर्ष माओवादी नेता तिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी और उसके साथियों ने गत सप्ताह तेलंगाना पुलिस के समक्ष सरेंडर किया है। टॉप माओवादी ‘देवजी’ 44 वर्षों से भूमिगत रहे हैं। मल्ला राजी रेड्डी @ संग्राम, सीसीएम, 46 वर्षों से भूमिगत, बड़े चोक्का राव उर्फ दामोदर उर्फ जगन 28 साल से भूमिगत और नरसिम्हा रेड्डी उर्फ गंगन्ना उर्फ सन्नू दादा, 36 साल से भूमिगत थे।