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Explainer: GPS का स्वदेशी विकल्प नाविक है क्या और कितना अलग है, सरकार क्यों दे रही है इसे बढ़ावा, जानें सबकुछ

Wed, 28 Sep 2022 10:44 AM IST
जयदेव सिंह स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

नाविक क्या है? यह कैसे काम करता है? सरकार नाविक को बढ़ावा क्यों दे रही है? यह सिस्टम अन्य वैश्विक या क्षेत्रीय नेविगेशन सिस्टम से कितना अलग है? इस सिस्टम को लागू करने के लिए मोबाइल कंपनियां क्या चाहती हैं? आइये जानते हैं...
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भारतीय जीपीएस NavIC - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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आपका स्मार्टफोन अब अमेरिकी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) की जगह स्वदेशी नैविगेशन विथ इंडियन कॉन्स्टलेशन (NavIC) यानी नाविक से लैस होगा।  आने वाली जनवरी से इसकी शुरुआत हो सकती है। केंद्र सरकार ने सभी मोबाइल निर्माता कंपनियों से इसे एक जनवरी 2023 से लागू करने के लिए कहा है। हालांकि, सरकार के निर्देश के बाद मोबाइल बनाने वाली कंपनियां परेशान हैं। नए सिस्टम को लागू करने में आने वाली अतिरिक्त लागत और बेहद कम समय को इसका कारण बताया जा रहा है। 

नाविक क्या है? यह कैसे काम करता है? सरकार नाविक को बढ़ावा क्यों दे रही है? यह सिस्टम अन्य वैश्विक या क्षेत्रीय नेविगेशन सिस्टम से कितना अलग है? इस सिस्टम को लागू करने के लिए मोबाइल कंपनियां क्या चाहती हैं? आइये जानते हैं...

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नाविक क्या है?

नाविक एक पूर्णत: स्वदेशी नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम है। इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा विकसित किया गया है। 2006 में सरकार से इस सिस्टम को विकसित करने की मंजूरी मिली। उस वक्त इसके लिए 174 करोड़ रुपये आवंटित हुए थे। मंजूरी मिलने के वक्त इसे 2011 तक पूर कर लिए जाने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन, सात साल देरी से 2018 में यह शुरू हुआ। नाविक आठ उपग्रहों की मदद से काम करता है। ये सिस्टम हिन्दुस्तान के पूरे भू-भाग को कवर करता है।  

क्या अभी नाविक का कहीं इस्तेमाल हो रहा है?

मौजूदा समय में नाविक का सीमित दायरे में प्रयोग रहा है। इसका उपयोग देश में सार्वजनिक वाहन ट्रैकिंग में किया जा रहा है। इसके साथ ही गहरे समुद्र में मछली पकड़ने गए मछुवारों को आपातकालीन चेतावनी देने के लिए भी यह सिस्टम इस्तेमाल किया जा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित जानकारी को ट्रैक करने और प्रदान करने के लिए भी यह सिस्टम इस्तेमाल हो रहा है। स्मार्टफोन को इस सिस्टम से लैस करना इस कड़ी में अगला कदम है।  

भारतीय NavIC - फोटो : Amar Ujala

GPS से कितना अलग है नाविक, क्या और भी सिस्टम इसके लिए काम कर रहे हैं?

GPS और नाविक सिस्टम में मुख्य अंतर दोनों द्वारा कवर होने वाले क्षेत्र में है। GPS पूरी पृथ्वी को कवर करता है। इसके उपग्रह दिन में दो बार पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। वहीं, नाविक भारत और उसके आसपास के इलाके में इस्तेमाल के लिए है। 

GPS की तरह कुछ और नेविगेशन सिस्टम दुनिया में इस्तेमाल होते हैं। यूरोपियन यूनियन में गैलीलियो, रूस में ग्लोनास और चीन में बीडो का इस्तेमाल करता है। इसी तरह QZSS को जापान संचालित करता है। भारत की सेटलाइट नेविगेशन ड्राफ्ट पॉलिसी 2021 के मुताबिक सरकार दुनिया के किसी भी हिस्से में NavIC सिग्नल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए "क्षेत्रीय से वैश्विक तक कवरेज का विस्तार" करने की दिशा में काम करेगी। भारत सरकार ने अगस्त में कहा था कि नाविक "स्थिति सटीकता के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका के जीपीएस जितना अच्छा है"। 

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सरकार नाविक को बढ़ावा क्यों दे रही है?

फरवरी 2020 में सरकार ने लोकसभा में कहा था कि नाविक मेक इन इंडिया की दिशा में एक कदम है। इसमें कहा गया था इस स्वदेशी रूप से विकसित प्रणाली के उपयोग से देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी।  

विदेशी उपग्रह प्रणालियों पर निर्भरता को दूर करने के लिए सरकार नाविक सिस्टम विकसित कर रही है। खासतौर पर रणनीतिक क्षेत्रों में निर्भरता कम करना इसका उद्देश्य है। जीपीएस और ग्लोनास जैसे विदेशी सिस्टम पर हमेशा भरोसा करना रणनीतिक तौर पर सही नहीं हो सकता है। क्योंकि, ये सभी उन देशों की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा संचालित होते हैं।  

इस सिस्टम को लागू करने के लिए मोबाइल कंपनियां क्या चाहती हैं?

स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियां सरकार के कदम से घबराई दिख रही हैं। सैमसंग, शाओमी और एपल जैसी कंपनियां इसे लागू करने करने के लिए दो साल की मोहलत मांग रही हैं। उनका कहना है कि इतनी जल्दी नाविक सिस्टम लागू करने पर फोन की लागत पर भी असर होगा। इसके साथ ही तकनीकी बाधाएं भी आएंगी। कंपनियां नाविक की वजह से उत्पादन और शोध लागत बढ़ने की बात कह रही हैं। ऐसे में इसे अगले साल की शुरुआत से ही लागू करने की कोशिश हुई तो आर्थिक नुकसान होगा।

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