#MeToo कैंपेन के जरिए सोशल मीडिया पर यौन उत्पीड़न की आवाज उठाने वाली एक भी महिला ने राष्ट्रीय महिला आयोग में शिकायत दर्ज नहीं कराई है। पिछले 15 दिनों से फिल्म और टीवी इंडस्ट्री समेत मीडिया संस्थानों में काम कर रही महिलाओं ने MeToo हैशटैग के जरिए सोशल मीडिया पर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के अनुभवों को साझा किया है। आयोग ने ऐसी कई पीड़ित महिलाओं से संपर्क कर उन्हें कानूनी मदद देने के भरोसा दिया, लेकिन किसी ने शिकायत दर्ज करने की हिम्मत नहीं दिखाई।
महिलाओं में ऐसे मुद्दों पर आवाज उठाने की हिम्मत तो आ रही है, लेकिन संभव है कि पारिवारिक वजहों के चलते पुलिस या कानूनी मामलों में उलझना नहीं चाहतीं हैं। आयोग ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान भी नहीं ले पा रहा है, क्योंकि इसके लिए पीड़िताओं को बयान देने के लिए आना पड़ेगा। राष्ट्रीय महिला आयोग शिकायतों को लेकर भेदभाव नहीं करता, चाहे वह राजनेताओं के खिलाफ हों या ब्यूरोक्रेट्स के खिलाफ, लेकिन शिकायतकर्ता को सामने आना ही पड़ेगा।
विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर के खिलाफ कार्रवाई होने से पहले मामलों की जांच होनी जरूरी है। यह सरकार का अधिकार है कि वह जांच के बाद क्या फैसला लेती है। अकबर के पास भी कोर्ट जाने और मानहानि का दावा ठोकने का अधिकार है और कानून यह अधिकार सभी को देता है।
सोशल मीडिया पर लोग बिना सोचे-समझे राष्ट्रीय महिला आयोग को बदनाम कर रहे हैं, यह बेहद चिंताजनक है। रोज 10 से ज्यादा शिकायतें शीबॉक्स वेबसाइट और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की तरफ से आती हैं, और हर साल 30 से 35 हजार शिकायतें आयोग को मिलती हैं, जिन पर हर संभव कार्रवाई की जाती है। वहीं, विशाखा गाइडलाइंस का पालन भी कई निजी कंपनियों में नहीं हो रहा है। कई कॉरपोरेट घरानों के अधिकारियों को तो इंटरनल कमेटी के बारे में जानकारी ही नहीं है। लगातार एडवाइजरी और प्रचार करने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई है।