ब्रिटेन-भारत के व्यापारिक रिश्तों को औपनिवेशिक इतिहास के नजरिये से देखना जरूरी: विशेषज्ञ
ब्रिटेन के साथ भारत के व्यापारिक रिश्तों को दोनों देशों के साझा औपनिवेशिक इतिहास के नजरिये से देखा जाना चाहिए और ब्रिटिश शासन की विरासत पर व्यापक राष्ट्रीय चर्चा भी होनी चाहिए। यह बात शुक्रवार को इंडिया हैबिटेट सेंटर में व्यापार की शर्तें: भारत, ब्रिटेन और साम्राज्य की लंबी छाया विषय पर हुई चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने कही।
15 जुलाई से लागू हुए भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते (सीईटीए) के बाद हुई इस चर्चा में शामिल विशेषज्ञों ने कहा कि ब्रिटेन के साथ भारत के संबंधों को महज व्यापार और कूटनीति के नजरिये से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि उसका प्रभाव आज भी देश की आर्थिक नीतियों, संस्थाओं और सार्वजनिक स्मृति पर दिखाई देता है। इतिहासकार प्रभु महापात्रा ने कहा कि भारत का औपनिवेशिक अनुभव साबित करता है कि मुक्त व्यापार व्यवस्था हमेशा एक जैसे नतीजे नहीं देती। उन्होंने बताया कि 1833 के बाद भारत में मुक्त व्यापार व्यवस्था थी और इसमें भारत का सबसे अधिक शोषण हुआ। देश को महज 2.5–5 फीसदी टैरिफ देना पड़ता, जबकि बाकी दुनिया पर 10 फीसदी टैरिफ लागू था और ब्रिटेन पर कोई टैरिफ नहीं लगता था। उन्होंने आगे कहा कि ब्रिटेन ने भारत की अर्थव्यवस्था को इस तरह ढाला कि देश पूरी दुनिया के लिए आपूर्ति केंद्र बनाकर नील किसानों, अफीम मजदूरों और गिरमिटिया श्रमिकों को वैश्विक व्यापार तंत्र से जोड़ दिया।
भारतीय डाटा तक बेरोक -टोक पहुंच से देश को हो सकता है खतरा
अर्थशास्त्री चरण सिंह ने सीईटीए की आलोचना करते हुए कहा कि ईस्ट इंडिया कंपनी के आने पर भारत की वैश्विक जीडीपी में 25 फीसदी हिस्सेदारी थी, जो उसके जाने तक एक फीसदी रह गई। आज यह लगभग चार फीसदी है। उन्होंने आशंका जताई कि ब्रिटेन की अधिक प्रति व्यक्ति आय उसे व्यापार की शर्तें तय करने में बढ़त दे सकती है। व्यापार नीति विशेषज्ञ अभिजीत दास ने कहा कि आधुनिक व्यापार समझौते अब वस्तुओं और सेवाओं से आगे बढ़कर डाटा गवर्नेंस जैसे रणनीतिक मुद्दों तक पहुंच गए हैं। उन्होंने डाटा को डिजिटल युग का नया तेल बताते हुए चेतावनी दी कि भारतीय डाटा तक बेरोक -टोक पहुंच देश की आर्थिक संप्रभुता और रणनीतिक हितों के लिए दीर्घकालिक खतरा बन सकती है।
चढ़ावा चोरी : ट्रस्ट के पुनर्गठन को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा निर्मोही अखाड़ा
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में निर्मोही अखाड़ा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। निर्मोही अखाड़े की ओर से याचिका दायर कर राम जन्मभूमि ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग की गई है। याचिका में 1950 और 1982 से स्थापित मूल विग्रहों को दोबारा स्थापित करने की मांग भी की गई है। चढ़ावा चोरी के मामले में ही एसआईटी से जांच की मांग वाली याचिका पर सोमवार को सुनवाई होगी। अपनी याचिका में अखाड़े ने ट्रस्ट को सार्वजनिक (पब्लिक) ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठित करने, उसके सभी वित्तीय और संपत्ति संबंधी लेनदेन की फोरेंसिक ऑडिट कराने तथा गर्भगृह में नव-प्रतिष्ठित मूर्ति के स्थान पर मूल विग्रहों को पुनः स्थापित करने की मांग की है।
तमिलनाडु दिवस पर सीएम विजय का बड़ा एलान, अब दो तारीखों पर होगा आधिकारिक उत्सव
तमिलनाडु दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने घोषणा की कि उनकी सरकार अब आधिकारिक तौर पर 1 नवंबर और 18 जुलाई, दोनों तारीखों को तमिलनाडु दिवस के रूप में मनाएगी। 1 नवंबर 1956 को मद्रास राज्य का गठन हुआ था, जबकि 18 जुलाई 1967 को तत्कालीन मुख्यमंत्री सी. एन. अन्नादुरै ने विधानसभा में राज्य का नाम बदलकर तमिलनाडु रखने का प्रस्ताव पारित कराया था। विजय ने तमिल भाषा, संस्कृति और सामाजिक न्याय की विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों और राज्य के नामकरण के लिए संघर्ष करने वाले नेताओं को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि तमिलनाडु को शिक्षा, तकनीक, कौशल और समानता के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बनाने के लिए सभी को मिलकर काम करना चाहिए।
पुलिस ने शनिवार को बताया कि एक नाबालिग लड़की के साथ दुर्व्यवहार करने वाले एक व्यक्ति की स्थानीय निवासियों और उसके रिश्तेदारों द्वारा पिटाई के बाद इलाज के दौरान मौत हो गई। कुलसुमपुरा निवासी 55 वर्षीय व्यक्ति पर आरोप है कि उसने लड़की (9) को गलत तरीके से छुआ, जिसे एक पड़ोसी ने देख लिया। पड़ोसी के विरोध करने पर आरोपी तुरंत मौके से फरार हो गया। बाद में, लड़की के परिवार के सदस्यों और स्थानीय निवासियों ने गुरुवार शाम को उसे चेतावनी दी और उसकी पिटाई की। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और उसे सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। शुक्रवार को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।आरोपी और उसे पीटने वालों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए। पुलिस ने बताया कि आरोपी अपनी पत्नी से अलग रहता था और अपनी मां के साथ रहता था।