राष्ट्रीय महिला आयोग ने शनिवार को कहा कि दफ्तर में महिलाओं के यौन उत्पीड़न को और विस्तृत रूप से परिभाषित करने की जरूरत है। आयोग ने कहा, लैंगिक साइबर अपराधों को शामिल करने की जरूरत है। आयोग ने इस संबंध में एक रिपोर्ट महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को भी सौंपी है।
आयोग ने कहा कि यौन उत्पीड़न की परिभाषा में अपराध की गंभीरता में अंतर किया जाना जरूरी है ताकि समिति उसी आधार पर कार्रवाई का स्तर तय कर सके। साथ ही आयोग ने कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में सुलह का प्रावधान खत्म किया जाना चाहिए। आयोग का तर्क है कि उत्पीड़न कोई विवाद नहीं है जिसमें सुलह की गुंजाइश तलाशी जाए।
आयोग ने दफ्तराें में यौन उत्पीड़न मामलों की जांच करने वाली आंतरिक समिति में सदस्यों को बढ़ाने का भी सुझाव दिया है, ताकि मामलों पर तर्कसंगत बहुमत का फैसला लेने में आसानी हो। अभी समिति में न्यूनतम चार सदस्यों को रखने का नियम है। इसके अलावा इन सदस्यों को नियमित रूप से केंद्रीय व राज्य प्राधिकरणों द्वारा प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।
आयोग ने रिपोर्ट में कहा कि पारदर्शिता कायम रखने के लिए कमेटी सदस्यों का चयन चुनावी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। आयोग ने यौन उत्पीड़न की शिकायत करने की अवधि को तीन से बढ़ाकर छह महीने करने की सिफारिश की है। इसके अलावा आयोग ने कार्यस्थल अधिनियम, 2013 में महिलाओं के यौन उत्पीड़न के प्रावधानों में संशोधन किए जाने का भी सुझाव दिया है।