चंद्रमा पर पहले मेटल यानी धातु की मौजूदगी के सबूत मिले थे, लेकिन अब पता चला है कि उसकी सतह के नीचे अंदाज से कहीं ज्यादा लोहा और टाइटेनियम मौजूद हो सकता है। नासा के वैज्ञानिकों ने चांद पर बर्फ खोजते-खोजते वहां के गड्ढों (क्रेटर्स) में बेहद बड़ी मात्रा में धातु की खोज कर डाली है।
नासा के वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के 4.5 साल के रहस्य से पर्दा उठा दिया है। चांद की सतह पर धातुओं की मौजूदगी है, यह जानकारी तो वैज्ञानिकों को पहले से पता थी, लेकिन नासा के लूनर रिकॉनसेंस ऑर्बिटर स्पेसक्राफ्ट (एलआरओ) के मिनिएचर रेडियो फ्रीक्वेंसी (एमआरएफ) उपकरण ने संकेत दर्ज किए कि इनकी मात्रा कहीं ज्यादा है और वहां लोहे और टाइटेनियम के भंडार हैं।
इस खोज की जानकारी 'अर्थ एंड प्लेनैटरी साइंस लेटर्स' में छपी है। पहले मेटल की मौजूदगी के सबूत मिले थे, लेकिन अब पता चला है कि उसकी सतह के नीचे अंदाज से कहीं ज्यादा लोहा और टाइटेनियम मौजूद हो सकता है।
इस खोज से जुड़े जॉन हापकिंस अप्लाइड फिजिक्स लैबोरेट्री एमआरएफ के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर वेस पैटरसन का कहना है कि इस रडार उपकरण के जरिए हमारे सबसे करीबी पड़ोसी की उत्पत्ति और संरचना की नई जानकारी देकर हमें हैरान कर दिया है। वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल ग्रह के आकार प्रोटोप्लैनेट या प्राग्ग्रह और एकदम नई पृथ्वी के बीच टक्कर से चांद की उत्पत्ति हुई थी। इसलिए चांद की रासायनिक संरचना पृथ्वी से मिलती जुलती है।
चांद का अंदरूनी हिस्सा एक समान नहीं है। चांद की सतह के उजाले वाले हिस्से जिन्हें लूनर हाइलैंड्स कहा जाता है, वहां चट्टानों में पृथ्वी की तरह कुछ मात्रा में धातु मिलते हैं। जब चांद के अंधेरे वाले हिस्से मरिया को देखा जाता है तो पता चलता है कि वहां कई जगहों पर पृथ्वी से भी ज्यादा धातु है।
इस अंतर की वजह से वैज्ञानिक हमेशा से उलझन में रहे हैं और इस बात पर शोध जारी रहा कि आखिर दूसरे पराग्ग्रह का चांद पर कितना असर रहा होगा। एमआरएफ को जो संकेत मिला है उससे इस सवाल का जवाब मिल सकता है। इसकी मदद से शोधकर्ताओं को चांद के उत्तरी गोलार्ध क्रेटर्स की मिट्टी में एक वैद्युतिक संपदा मिली है। इसे डाइइलेक्ट्रिक कॉन्स्टेंट कहते हैं।
इसकी मदद से गड्ढों में छिपी बर्फ को खोजा जा रहा था। इस शोध से जुड़े यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया (लास एंजलिस) में एमआरएफ एक्सपेरिमेंट के को-इन्वेस्टिगेटर एसम हेगी का कहना है कि चांद पर विशाल गड्ढे छोड़ने वाले उल्कापिंड उसकी गहराई में जाते हैं। अंदाजा है कि बड़े आकार के गड्डों में इस खास प्रॉपर्टी की वजह से जब उल्कापिंड गहराई में जाते हैं तो चांद की अंदरूनी सतह से लोहे और टाइटेनियम ऑक्साइड जैसे मेटल बाहर निकल आते हैं जो आमतौर पर सतह के काफी नीचे रहते हैं और उनकी मौजूदगी के बारे में पता नहीं चलता है।
जितनी ज्यादा इन मेटल्स की मात्रा होती है, डाइइलेक्ट्रिक प्रॉपर्टी भी उतनी ही ज्यादा होती है। इस बात की पुष्टि भी तब हो गई जब एमआरएफ के रडॉर से मिलीं तस्वीरों और एलआरओ के वाइड एंगल कैमरा, जापान के कगूया मिशन और नासा के लूनर प्रॉस्पेक्टर स्पेसक्राफ्ट से मिले मेटल ऑक्साइड के मैप की तुलना की गई। बड़े गड्ढों में सतह से आधा किमी नीचे तक कम मेटल मौजूद था जबकि आधा किलोमीटर से लेकर दो किलोमीटर नीचे तक बेहद बड़ी मात्रा पाई गई।
नासा के गॉडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर में एलआरओ प्रॉजेक्ट साइंटिस्ट नोओ पेट्रो का कहना है कि एमआरएफ से मिलने वाले नतीजों से पता लगता है कि लूनर स्पेसक्राफ्ट के चांद पर 11 साल तक ऑपरेशन करने के बाद भी हम अपने सबसे नजदीकी पड़ोसी के पुरातन इतिहास के बारे में नई खोज कर रहे हैं।