सवाल मौजूं है। मेरठ, बागपत, बिजनौर, मुजफ्फरनगर हर जगह के किसानों के बीच में चर्चा का विषय बना हुआ है। पुराने किसान नेता, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सांसद रहे हरेन्द्र मलिक भी इस सवाल पर खुलकर नहीं बोल पा रहे हैं। लगभग सभी किसान नेता विश्वसनीयता को लेकर जुबान पर चुप्पी साधे हैं और किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर भारतीय किसान यूनियन के नेता नरेश टिकैत किसान आंदोलन को रात 12.30 बजे ही खत्म करके क्यों भाग गए?
भाकियू का जवाब
इस बारे में भाकियू के प्रवक्ता धमेन्द्र मलिक से सवाल किया। मलिक ने कहा कि किसानों के सवाल जायज हैं। लेकिन दो बार की बातचीत के बाद हमें और हमारे नेताओं को लगा कि सरकार घमंड में चूर है। यह हमारी मांगों को नहीं मान रही है। बात को भी ध्यान से नहीं सुन रही है। इस आंदोलन से सरकार का चेहरा बेनकाब हो चुका है।
इसलिए हमने ऐसा निर्णय लिया। मलिक का कहना है कि संघर्ष एक दिन में खत्म नहीं होता और हम जल्द ही इसे जिलेवार संघर्ष करके बड़ा आंदोलन बनाएंगे। धमेन्द्र मलिक का कहना है कि हमारा मकसद सरकार के सामने अपना पक्ष रखना, उसे किसानों की मांग से अवगत कराना और लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिवस के दिन किसान घाट तक जाना था। हम किसान घाट तक गए।
किसान नेताओं की सुनिए
शामली के किसान राकेश मलिक भी इससे हतप्रभ हैं। उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है। राकेश अपनी इच्छा से अपने ट्रैक्टर से किसान आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए गाजियाबाद तक आए थे। नरेश टिकैत ने भी अपने बयान में साफ कहा है कि सरकार ने उनकी मुख्य मांगों को नहीं माना है। उनपर विचार करने का आश्वासन दिया है। किसान नेता पुष्पेन्द्र सिंह का कहना है कि किसान की बात सरकार नहीं सुन रही है। जो किसानों के मुख्य मुद्दे थे और सबसे अहम मांग थी, उसका कोई समाधान नहीं हुआ है।
अब ऐसे में किसान क्या कर सकता है? पुष्पेन्द्र सिंह के अनुसार सरकार किसानों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात भी नहीं रखने दे रही है। उसे दिल्ली में प्रवेश करने से रोका जा रहा है और सरकार कैनन से उस पर पानी की बौछार कर रही है। उस पर आंसू गैस के गोले, रबर के गोले, लाठी बरसाई जा रही है।
कुछ इसी तरह की बात हरेन्द्र मलिक भी कहते हैं। मलिक के अनुसार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों में भारी नाराजगी है। उन्हें सरकार न तो जीने दे रही है और न मरने दे रही है। रोज आरसी कट रही है और कोई न कोई कर्ज के बोझ से दबा किसान जेल जा रहा है। जब केन्द्र सरकार ने उसकी बात नहीं सुनी तो वह अब जाकर अपनी पक रही फसलों की चिंता करके वापस लौट गया है।
क्या है किसान आंदोलन के पीछे की राजनीति?
चर्चा तरह-तरह की है। पहली तो यह कि किसान दिन भर की परेशानी झेलकर सो रहे थे। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह समेत अन्य से बातों का दौर चल चुका था। केन्द्र सरकार के राज्यमंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत भी आकर लौट चुके थे और किसान सड़क के किनारे जहां भी जगह पाए थे, सो रहे थे। फिर त्रिपुरा भवन में ऐसी कौन सी बैठक हुई, जिसने उन्हें सुबह का आंदोलन जारी रखने वाला सूरज नहीं देखने दिया? कुछ लोगों को इस पूरे खेल में बड़ी राजनीति दिखाई दे रही है।
23 सितंबर को हरिद्वार से चला किसानों का जत्था एक अक्तूबर तक बिना किसी हिंसा, उत्पात के मुरादनगर तक आ गया था। हिंडन के पास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी किसानों से बात की, लेकिन बात नहीं बनी। गाजियाबाद में दिल्ली के बॉर्डर के समीप पहुंचने पर भी किसानों ने कोई उत्पात नहीं मचाया था। फिर भी किसानों पर पुलिस ने लाठी भांजी, आंसू गैस के गोले छोड़े। केन्द्र सरकार ने दिल्ली में प्रवेश से रोका।
टिकैत की भूमिका को लेकर उठते सवाल
किसान हरिद्वार से अपनी मांग मंगवाने तक के लिए निकले दिखाई दे रहे थे। किसानों की तादाद, उनकी तैयारी भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के आंदोलन की याद दिलाने लगी थी। एक बड़े किसान नेता का कहना है कि इस आंदोलन में कई राज्यों के किसान संगठनों ने भाग लेना शुरू कर दिया था। सूत्र के मुताबिक उनका संगठन भी भाग लेने के लिए दिल्ली चल चुका था।
सूत्र का तर्क है कि जब दिन में सरकार के लाठी भांजने की भद्द पिट चुकी थी, तो देर रात या अगले दिन इस तरह की घटना दोहराये जाने की संभावना न के बराबर थी। लेकिन उनकी भी समझ में नहीं आ रहा है कि भाकियू के अध्यक्ष ने यह निर्णय क्यों लिया? वह भाकियू के इतिहास से इतना बड़ा खिलवाड़ कैसे कर बैठे?
सरकार को था कांग्रेस अध्यक्ष राहुल का भय
कई किसान नेताओं का मानना है कि रालोद के चौधरी अजीत सिंह के पहुंचने के बाद किसानों में उत्साह आ गया था। कांग्रेस के सूत्र भी बताते हैं कि वर्धा से कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से लौटने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष ने किसानों के बीच में जाने का निर्णय ले लिया था। वह सुबह गाजियाबाद किसानों के बीच में जाने की तैयारी कर चुके थे।
माना जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष के वहां जाने का अनुमान सरकार को भी था और सरकार किसानों की मांग को लेकर किसी तरह का कोई श्रेय राहुल गांधी को नहीं लेने देना चाहती थी। इसके अलावा दो अक्टूबर का भी दिन था। ऐसे में किसान आंदोलन ने सरकार के प्रचार अभियान की भी हवा निकाल दी थी। लिहाजा केन्द्र सरकार ने दबाव बढ़ाया और भाकियू को अपने कदम पीछे हटने पड़े।
चर्चा यह भी है
किसानों के चौपाल की गपशप से यह चर्चा आई है। बताते हैं कि इस किसान यात्रा में भाजपा के ही कुछ नेता पर्दे के पीछे से सक्रिय थे। इसमें किसी सुभाष चौधरी की भूमिका महत्वपूर्ण बताई जा रही है। किसान पूर्व केन्द्रीय मंत्री संजीव बालियान के क्षेत्र से अधिक थे। जाट किसानों की संख्या काफी थी। वहीं लंबे समय से संजीव बालियान साइडलाइन चल रहे हैं। अशोक बालियान भी मंझे हुए और समझदार हैं।
उत्तर प्रदेश में सुरेश राणा का भी अहम रोल बताया जा रहा है। इस तरह से केन्द्र सरकार और भाजपा की आलोचना करने वाले वर्ग का कहना है कि इस पूरे आंदोलन में कहीं न कहीं भाजपा के नेताओं का पर्दे के पीछे से प्रभाव था। उन्होंने किसान यात्रा एक मकसद से आगे बढ़ाई और जहां लगा, वहां से इसे समाप्त करा दिया? इस बारे में नरेश टिकैत, राकेश, टिकैत, युद्धवीर सिंह से बात करने प्रयास सफल नहीं हो पाए।