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इजरायली सेना के इन कारनामों के 'मुरीद' हैं PM नरेंद्र मोदी'

Wed, 05 Jul 2017 04:45 PM IST
बीबीसी हिन्दी
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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसराइल का दौरा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बन गए हैं। पिछले साल अक्टूबर में हिमाचल प्रदेश में एक जन सभा को संबोधित करते हुए मोदी इसराइली सेना की तारीफ कर चुके हैं।
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हिमाचल प्रदेश के मंडी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने 18 अक्तूबर, 2016 को कहा था, "आजकल पूरे देश में हमारी सेना के पराक्रम की चर्चा हो रही है। पहले कभी इसराइल ने ऐसा किया, सुनते थे, लेकिन देश ने देखा कि भारत की सेना भी किसी से कम नहीं है।"।

उन्होंने इस संबोधन में भारत पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना के किए गए 'सर्जिकल स्ट्राइक' का जिक्र नहीं किया था, लेकिन ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि उनका संकेत उसी ओर था। लेकिन सवाल यह है कि इसराइली सेना ने किस तरह के स्ट्राइक्स किए हैं और इन हमलों को कब और कैसे अंजाम दिया. एक नज़र उन मामलों पर जिनके कारण इसराइली सेना की दुनिया भर में इतनी धाक रही है।
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1. सोलह मई, 2014: इसराइली सेना ने गजा के समुद्री तट पर मिसाइल से स्ट्राइक किया था, जिसमें चार बच्चों की मौत हुई थी। इस हमले में नौ साल के मोहम्मद रामेज बकर, 10-10 साल के अहेद अतेफ़ बकर और जाकिरया अहेद बकर के साथ 11 साल के इस्माइल मोहम्मद बकर की मौत हुई था। हमले की निंदा: इस हमले की दुनिया भर में काफी निंदा हुई थी।

संयुक्त राष्ट्र ने इस हमले को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानूनों का उल्लंघन माना था इसराइल का पक्ष: इस हमले में बच्चों की मौत की दुनिया भर में हुई निंदा से इसराइली सेना पर इतना दबाव पड़ा कि उन्हें इसकी जांच करानी पड़ी। जांच रिपोर्ट में कहा गया कि सेना ने अनुमान लगाया था कि समुद्री तट पर हमास के लड़ाके जुटे हैं और सेना ने इस गलती के लिए खेद भी जताया था।

2. आठ जुलाई-26 अगस्त, 2014: लगभग 50 दिनों तक इसराइली सेना ने ग़ज़ा पट्टी में लगातार हमले किए. इन हमलों का असर आप ऊपर की तस्वीर में देख सकते हैं, जिसमें 25 जुलाई की तस्वीर एक पूरे इलाके के तबाह होने का संकेत दे रही है। हमले के पहले ही दिन इसराइली वायुसेना ने गजा के 160 ठिकानों पर बम वर्षक विमानों से हमला किया।

इसराइली सेना के मुताबिक इस हमले में उन्होंने ग़ज़ा में 5,226 जगहों को निशाना बनाया गया संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इन हमलों में 2,104 फ़लीस्तीनी लोगों की मौत हुई, इनमें 495 बच्चे और 253 महिलाएं थीं। घायल हुए लोगों में 1462 आम नागरिक थे। हमले की निंदा: संयुक्त राष्ट्र सहित दुनिया के कई देशों ने फ़लीस्तीनी आम नागरिकों की मौत पर काफ़ी सवाल उठाए थे। मिस्र के दखल के बाद 50 दिनों की हिंसा थमी थी।

इसराइल का पक्ष: इसराइली सेना की ओर से कहा गया कि 8 जुलाई और 31 अगस्त के बीच हमास के चरमपंथियों ने 4,591 रॉकेट दागे, लिहाजा जवाबी कार्रवाई के लिए उन्हें भी रॉकेट लांचरों से हमले करने पड़े. इन हमलों में 66 इसराइली सैनिकों के अलावा छह आम नागिरक मारे गए थे।

3. चौदह से इक्कीस नवंबर, 2012: इसराइली सेना ने नवंबर, 2012 के तीसरे सप्ताह में हुए इस हमले को ऑपरेशन पिलर का नाम दिया गया था। इस हमले में गजा पर कई हवाई हमले किए गए थे। इस हमले में हमास के मिलिट्री विंग के कमांडर अहमद जाबारी भी मारे गए थे। इन हमलों में गजा के तत्कालीन प्रधानमंत्री के दफ़्तर सहित आधारभूत ढांचों का बहुत नुकसान हुआ था।

मानवाधिकार समूह बीतेस्लेम के मुताबिक इन हमलों में 167 फ़लस्तीनियों की मौत हुई थी, जिसमें 87 आम नागरिक थे। इन हमलों में इसराइल के दो सैनिक और चार नागरिकों की मौत हुई थी।

इसराइल का पक्ष: इस हमले के बाद इसराइली प्रधानमंत्री के प्रवक्ता मार्क रागेव ने बीबीसी से बातचीत में कहा था इन सर्जिकल हमलों को ज्यादा से ज्यादा मानवीय रखने की कोशिश की गई और ये हमले दक्षिण इसराइल में हमास की ओर से किए गए हमलों के जबाव में किए गए थे।

4. 27 दिसंबर-18 जनवरी, 2009: दिसंबर, 2008 के अंतिम सप्ताह में इसराइली सैनिकों ने जमीनी रास्ते से गजा में प्रवेश कर ऑपरेशन कास्ट लीड को अंजाम दिया था। इस हमले में मानवाधिकार संगठन बीतेस्लेम के मुताबिक 1391 फ़लस्तीनी मारे गए। इनमें करबी 759 आम नागरिक, 344 बच्चे और 110 महिलाएं शामिल थे। इस कार्रवाई पर एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में कहा गया कि इसराइली सैनिकों ने लगातार चिकित्सीय सुविधाओं को बाधित किया जिसके चलते आम नागरिकों की जानें गईं।

सराइली सेना पर इस अभियान में श्वेत फॉस्पोरस और टैंकों में इस्तेमाल होने वाले गोलों के इस्तेमाल के आरोप लगे थे, जिसे लेकर उनकी काफ़ी आलोचना भी हुई।

इसराइल का पक्ष: इसराइल की ओर से लगातार कहा जाता रहा कि हमास के चरमपंथी लगातार रॉकेट लांचरों से हमले कर रहे थे।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट ने भी माना कि हमास और दूसरे फ़लीस्तीनी चरमपंथी समूहों की ओर से रॉकेट दागने से फ़लस्तीन की आम जनता ख़तरे में आ गई है। इन सैन्य अभियानों से इसराइली सेना की ताकत का वास्तविक अंदाजा लगाना मुश्किल हो, लेकिन इसराइली सेना के दो ऑपरेशन को आज भी लोग मिसाल के तौर पर देखते हैं। इन दोनों ऑपरेशनों को बीते 40 साल से ज्यादा हो चुके हैं। यह एक तरह से चरमपंथियों से निपटने का हमला था तो इस पर मानवाधिकार संगठनों ने सवाल भी नहीं उठाए।
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5. चार जुलाई, 1976: इसराइली सेना के कमांडो ने 'ऑपरेशन जोनाथान' नामक अभियान में एक सौ से ज्यादा बंधकों को बचाया था। इस मामले की शुरूआत तब हुई जब 27 जून, 1974 को इसराइल से एथेंस के रास्ते पेरिस रवाना होने वाले एक यात्री विमान को चार चरमपंथियों ने अगवा कर लिया।

विमान में 250 लोग सवार थे। फलस्तीनी समर्थक चरमपंथी विमान को यूगांडा के इनत्बे ले गए. 28 जून को विमान इनत्बे पहुंचा। इसराइली सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल जोनाथन नेतान्याहू की प्रतिमा यूगांडा के इनत्बे में यहां पर चरमपंथियों के तीन और साथी आ गए। इन लोगों ने इसराइल और चार अन्य देशों की जेल में बंद 53 चरमपंथियों को रिहा करने की मांग की।

यूगांडा के राष्ट्रपति ईदी अमीन ने भी चरमपंथियों का साथ दिया और उन्हें हथियार और अपनी सेना के जवान मुहैया कराए। एक जुलाई को कई लोग रिहा भी किए गए, लेकिन 100 से ज्यादा यहूदी-इसराइली बंधक बने हुए थे।

​किसी को कल्पना नहीं हुई और 2500 मील दूर से इसराइली सेना के तीन विमानों में सवार 200 कमांडो इनत्बे एयरपोर्ट पहुंच गए। महज 35 मिनट की कार्रवाई में उन्होंने सातों चरमपंथी और यूगांडा के 20 जवानों को मार कर अपने लोगों को रिहा करा लिया। इस कार्रवाई में इसराइली सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल जोनाथन नेतान्यूह की मौत हुई थी। मौजूदा प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतान्याहू जोनाथन के छोटे भाई हैं।

6. सोलह मई, 1974: इसराइली सेना ने फ़लस्तीनियों के शरणार्थी कैंपों पर बम बरसाए थे। लड़ाकू विमानों ने दक्षिणी लेबनान के गांवों में बने सात कैंपों को तबाह कर दिया था। इस हमले में कम से कम 27 लोग मारे गए थे और 138 लोग घायल हुए थे। ये हमला लेबनान की सीमा पर बसे मालेट में एक सौ से ज्यादा इसराइली स्कूली छात्रों को बंधक बनाने के बदले के तौर पर लिया गया था।

फलस्तीनी पॉपुलर डेमोक्रेटिक फ्रंट के तीन चरमपंथियों ने 105 छात्रों सहित 115 इसराइलियों को बंधक बना लिया था, ये लोग इसराइली जेलों में बंद 23 साथियों को रिहा करने की मांग कर रहे थे।

इसराइली सेना ने उस स्कूल पर हमला किया था, जिसमें छात्रों को बंधक बनाया गया था। इसमें 22 बच्चों सहित कुल 25 लोगों को चरमपंथियों ने मार दिया था। तीनों चरमपंथी मारे गए थे, जबकि 68 लोग घायल भी हुए थे। इसकी अगली सुबह इसराइली वायुसेना ने चरमपंथी कैंपों पर हमला किया था।
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