केंद्र सरकार ओबीसी के एक बड़े समुदाय को आरक्षण की छतरी तले लाने की तैयारी में है। केंद्र इसके लिए सालाना आय की सीमा को 6 लाख से बढ़ाकर 8 लाख कर सकती है।
यह प्रस्ताव कैबिनेट के उस नोट का हिस्सा है जिसे सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने तैयार किया है। इस प्रस्ताव से स्पष्ट है कि बीजेपी अगले साल होने वाले राज्य चुनावों में ओबीसी वोटरों को लुभाने की तैयारी में है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश में, जहां ओबीसी कुल जनसंख्या का 40 फीसद हैं।
मौजूदा समय में सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में और उच्च शिक्षा में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। हालांकि इसके साथ सालाना आय 6 लाख से कम होनी चाहिए।
हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक 12 अगस्त को मानसून सत्र खत्म होने के बाद कैबिनेट इस प्रस्ताव को मंजूर कर सकता है।
1980 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक ओबीसी की आबादी देश की जनसंख्या का 52 फीसद है। हालांकि इस रिपोर्ट में आंकड़े 1931 में हुई जनगणना से लिए गए थे। 80 सालों बाद 2011 में एक बार फिर जाति जनगणना हुई, लेकिन सार्वजनिक हो पाई।
नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) ने 2006 में ओबीसी की जनसंख्या 41 फीसद बताई थी। हालांकि इसे प्रामाणिक नहीं माना गया क्योंकि एनएसएसओ उपभोग व्यय को दर्ज करता है, जनसंख्या को नहीं।
कांग्रेस के मनीष तिवारी ने इसे बीजेपी की चाल बताते हुए पिछड़ा वर्ग, दलित, और गरीबों के मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश करार दिया है। समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की।