कई दशकों तक, केंद्रीय बजट के बाद पालखीवाला के व्याख्यान पूरे देश में चर्चा का विषय बनते थे। कहा जाता था कि भारत में दो बजट भाषण होते हैं- एक वित्त मंत्री का और दूसरा नानी पालखीवाला का, निसंदेह दूसरा अधिक प्रभावशाली भाषण माना जाता था।
आम बजट को जल्दबाजी में नहीं समझा जा सकता। इसकी जटिलताओं को समझने में वक्त लगता है। दरअसल, यह सरकार, देश के नामचीन अर्थशास्त्रियों और अधिकारियों की महीनों की मेहनत का नतीजा होता है, जो देश की भावी दशा दिशा तय करता है। प्रख्यात अर्थशास्त्री और कानूनविद स्व. नानी पालखीवाला बजट पर कुछ दिन बाद प्रतिक्रिया देते थे। उनके इस बजट भाषण की देशभर में चर्चा होती थी। उनकी कही बातों पर लोग वित्त मंत्री से ज्यादा भरोसा करते थे।
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नानी पालखीवाला ने 1958 से 1994 तक लगातार हर साल बजट के दूसरे दिन या आने वाले रविवार को अपनी 'पोस्ट-बजट स्पीच' (Post-Budget Speeches) दी। ये भाषण 'फोरम ऑफ फ्री एंटरप्राइज' द्वारा आयोजित किए जाते थे। उनके यह भाषण इतने लोकप्रिय होते थे कि इसे बजट पर आम जनता का विश्लेषण माना जाता था। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शुरुआत में यह छोटे हॉल में होता था, लेकिन बाद में दर्शकों की संख्या इतनी बढ़ गई कि इसे मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम में आयोजित करना पड़ा, जहां उन्हें सुनने 1,00,000 से अधिक लोग आते थे। इनमें टाटा समूह समेत मुंबई की कई नामचीन कंपनियों के अधिकारी और रिजर्व बैंक के अधिकारी भी शामिल होते थे।
दो बजट भाषण होते थे, एक वित्त मंत्री का दूसरा पालखीवाला का
कई दशकों तक, केंद्रीय बजट के बाद पालखीवाला के व्याख्यान पूरे देश में चर्चा का विषय बनते थे। कहा जाता था कि भारत में दो बजट भाषण होते हैं- एक वित्त मंत्री का और दूसरा नानी पालखीवाला का, निसंदेह दूसरा अधिक प्रभावशाली भाषण माना जाता था। बाद में उनके भाषण मुंबई के अलावा बेंगलुरू समेत कई शहरों में होने लगे थे। लेकिन, उनके निधन के बाद ऐसी किसी शख्सियत ने यह जिम्मेदारी नहीं निभाई। हालांकि, सोशल मीडिया और एआई के दौर में धीरे-धीरे नामवर लोगों और विशेषज्ञों की पूछपरख कम भी पड़ने लगी है।