केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच बढ़ी सियासी खींचतान महत्वाकांक्षी योजना नमामि गंगे पर भारी पड़ती दिख रही है। दरअसल, केंद्र ने राज्य सरकार को पत्र लिख कर विभिन्न शहरों में गंगा घाटों के विकास, किनारे बसे गांवों में नालों और श्मशान घाटों के विकास के लिए अपनी नोडल एजेंसी को अनापत्ति प्रमाण पत्र दिलवाने का अनुरोध किया है।
लेकिन प्रदेश सरकार ने अपने जिलाधिकारियों को किसी भी सूरत में एजेंसी को एनओसी नहीं देने का फरमान सुना दिया है।
राज्य सरकार का कहना है कि ऐसे कार्यों के लिए उसने पहले ही नोडल एजेंसी नियुक्त कर दिया है। फिर केंद्र की नोडल एजेंसी के मामले में मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (एमओए) अभी विचाराधीन है। ऐसे में एनओसी देना उचित नहीं है।
अमर उजाला के पास जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के संयुक्त सचिव और नेशनल मिशन फॉर ग्रीन गंगा के डायरेक्टर रजत भार्गव की ओर से 6 जून को यूपी सरकार के एसजीआरसीए के सचिव और प्रोजेक्ट डायरेक्टर श्रीप्रकाश सिंह को इस आशय का लिखा गया पत्र और राज्य के जिलाधिकारियों को एनओसी न देने की हिदायत वाला पत्र मौजूद है।
अविरल और निर्मल गंगा की बाट जोह रहे देश को इसके लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। दरअसल केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार में इस बात पर ठन गई है कि नमामि गंगे परियोजना के तहत घाटों का विकास, नालों और श्मशान घाटों का विकास कौन कराए।
20 जून को राज्य सरकार को लिखे पत्र में केंद्र ने नमामि गंगा परियोजना के संदर्भ में एंट्री लेवल गतिविधि के तहत किए जाने वाले कार्यों का उल्लेख करते हुए ईआईएल को नोडल एजेंसी बनाने की सूचना दी है।
पत्र में कहा गया है कि राज्य सरकार अपने जिलाधिकारियों को नोडल एजेंसी को एनओसी देने के लिए कहे। जवाब में राज्य सरकार की ओर से श्रीप्रकाश सिंह ने सूबे के जिलाधिकारियों को पत्र लिख कर ऐसे कार्यों के लिए पहले से ही नोडल एजेंसी नियुक्त होने की जानकारी दी है।