उत्तर प्रदेश में चुनाव के एलान से पहले अखिलेश सरकार के 17 अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) को अनुसूचित जाति (एससी) की श्रेणी में शामिल करने के दांव को धूल झोंकने वाला कदम बताया है। उन्होंने दावा किया कि जब वह मुख्यमंत्री थी तो उन्होंने पहले केंद्र सरकार के पास यह प्रस्ताव भेजा था। जो अभी भी भारत सरकार के पास लंबित पड़ा हुआ है। उन्होंने कानूनी तौर पर अखिलेश सरकार के फैसले को एकतरफा और गलत करार दिया।
मायावती ने कहा कि 2005 में भी मुलायम सरकार ने संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ जाकर अपनी सरकार के स्तर पर ही इन्हें ओबीसी से हटाकर एससी में शामिल कर लिया। इसकी वजह से ओबीसी की 17 जातियां न तो ओबीसी में जातियों के लोग पूरी तरह से आरक्षण से वंचित रह गए। मायातवी ने कहा कि जब उनकी सरकार 2007 में सत्ता में आई तो इन जातियों को फिर से आरक्षण के दायरे में लाया गया। साथ ही एससी का कोटा बढ़ाने की शर्त पर इन वर्गों को एससी में शामिल करने की भी सिफारिश केंद्र सरकार से की गई थी।
बसपा सुप्रीमो ने कहा कि कानूनी तौर पर यह फैसला एकतरफा है और गलत है, क्योंकि अनुसूचित जाति की सूची में किसी भी जाति को शामिल करने या हटाने का अधिकार किसी राज्य की विधानसभा या राज्य सरकार के पास नहीं। उन्होंने कहा कि बसपा सरकार के प्रस्ताव को ही अखिलेश सरकार को आगे बढ़ाना चाहिए था। मगर राज्य सरकार ने अपने शासनकाल में एक बार भी इसे लेकर केंद्र सरकार पर दबाव नहीं बनाया। उन्होंने कहा कि अब जब चुनाव के समय समाज को गुमराह करने का प्रयास किया जा रहा है। यह दुखद और निंदनीय है।