सर्वोच्च न्यायालय में तीन तलाक का मुद्दा उठने और इस पर चौतरफा चर्चाओं के बीच मुस्लिम महिलाएं अपने अधिकारों के लिए मुखर हुई हैं। जागरूकता के कारण उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और इंसाफ के लिए वह मजहब की दीवार लांघकर कानून की शरण लेने लगी हैं। पारिवारिक परामर्श केंद्रों और अदालतों में मुस्लिम महिलाओं के साथ हिंसा और तीन तलाक के मामले पहले से बढ़े हैं। हालांकि मुफ्ती, काजी और मौलाना इसे नकार रहे हैं।
अकेले इलाहाबाद में ही पारिवारिक परामर्श केंद्र और परिवार न्यायालय में मुस्लिम महिलाओं के उत्पीड़न के मामले डेढ़ गुना बढ़ गए हैं। पिछले साल मार्च और अप्रैल में जहां दस मामले आए थे वहीं इस साल इन महीनों में 15 मामले आए हैं। इनमें तलाक के अलावा पत्नी से मारपीट और उत्पीड़न के मामले हैं।
कानपुर से भी ऐसी ही सूचना है। प्रोबेशन अधिकारी रागिनी पांडेय कहती हैं कि पिछले साल की तुलना में इस वर्ष मुस्लिम महिलाओं के साथ हुए घरेलू हिंसा के मामले अदालत में ज्यादा आए हैं। अलीगढ़ में भी मुस्लिम महिलाओं के अदालत पहुंचने के मामलों में 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इस साल जनवरी से अप्रैल तक 350 पारिवारिक विवाद के मामलों में 180 केस मुस्लिम परिवारों से ही जुड़े हैं।
आगरा परिवार न्यायालय में दशकों से वकालत कर रहे अधिवक्ता अमीर अहमद कहते हैं कि वर्ष 1982 में जब उन्होंने वकालत शुरू की थी, तब महज तीन केस ही तलाक के चल रहे थे। आज हर दस में से तीन मामले मुस्लिम समाज के हैं।
मुरादाबाद के परिवार न्यायालय में करीब 26 सौ मामले चल रहे हैं जिसमें तीन सौ केस तलाक के हैं। चालीस मामले तो बीते छह से आठ महीने में ही दर्ज कराए गए हैं। जबकि पहले दस-पंद्रह मामले ही अदालत तक पहुंचते थे।
खीरी केजिला समन्वयक नजमुल हसन सिद्दीकी और जोनल कोआर्डिनेटर रीतू वर्मा बताती हैं कि मुस्लिम महिलाएं अब 100 डायल के साथ महिला थानों व सामाजिक संगठनों के माध्यम से अपनी आवाज उठाने लगीं हैं। अब तक ऐसे छह मामले सामने आ चुके हैं।
बरेली के पुलिस पमामर्श केंद्र में इस साल जनवरी से मार्च तक तीन तलाक के 18 मामले, दहेज प्रताड़ना के 12 जबकि मारपीट और अत्याचार के छह मामले सामने आए हैं। शाहजहांपुर में करीब तीन हजार केस पारिवारिक विवाद के चल रहे हैं, जिनमें दस फीसदी मामले तलाक और मुस्लिम महिलाओं के गुजारा भत्तों से जुड़े हैं। पुलिस परामर्श केंद्र में एक साल में करीब 540 मामले दर्ज किए गए जिनमें करीब 20 फीसदी मामले मुस्लिम समाज के ही हैं। परिवार परामर्श केंद्र के प्रभारी शाहिद अली ने बताया कि तलाक के मामलों की अपेक्षा मुस्लिम महिलाओं के गुजारा भत्ता के केस अधिक हैं।
शाहजहांपुर परिवार न्यायालय में इस साल जनवरी से अप्रैल तक हर्जा खर्चा के 57 जबकि तीन तलाक के छह मामले आए हैं। हालांकि शाहजहांपुर के शहर काजी मसूद हसन का दावा उलट है। वह कहते हैं कि पहले प्रति वर्ष करीब 60 से 70 मामले तलाक के होते थे लेकिन 2016 में केवल छह मामले और इस साल महज तीन मामले ही अब तक सामने आए हैं। अदालतों महिला सहायता केंद्रों में मुस्लिम महिलाओं के रुख करने की जो स्थितियां यूपी में हैं कमोबेश उत्तराखंड और पंजाब से भी ऐसी ही सूचनाएं आ रही हैं।
देहरादून की महिला हेल्प लाइन प्रभारी ज्योति नेगी कहती हैं कि मुस्लिम महिलाओं द्वारा घरेलू हिंसा और पारिवारिक विवाद के मामले बढ़े हैं। बीते एक महीने में 49 मामले सामने आए जिनमें से 11 का निस्तारण कर दिया गया है।