सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कर्नाटक सरकार ने कहा, केवल इसलिए कि पूर्व में धर्म के आधार पर आरक्षण प्रदान किया गया है, इसे हमेशा के लिए जारी रखने का कोई आधार नहीं है
कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि उसने मुस्लिम समुदाय के लिए केवल धर्म के आधार पर आरक्षण खत्म करने का फैसला सोच-समझकर लिया है क्योंकि यह असांविधानिक है और भारत के संविधान के अनुच्छेद- 14, 15 व 16 की अवधारणा के विपरीत है। राज्य सरकार ने यह भी कहा कि पूरे मुस्लिम समुदाय को आरक्षण प्रदान करना सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
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सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कर्नाटक सरकार ने कहा, केवल इसलिए कि पूर्व में धर्म के आधार पर आरक्षण प्रदान किया गया है, इसे हमेशा के लिए जारी रखने का कोई आधार नहीं है, खासकर जब यह एक असांविधानिक सिद्धांत के आधार पर हो। मुस्लिम समुदाय के भीतर वे समूह जो 2002 के आरक्षण आदेश में पिछड़े पाए गए थे, वे आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं।
राज्य सरकार ने अपने लिखित जवाब में कहा, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग (एसईबीसी) के रूप में नागरिकों के एक समूह को वर्गीकृत करने की शक्ति को संविधान के अनुच्छेद- 14, 15 और 16 के प्रावधानों के अनुसार प्रयोग किया जाना चाहिए।
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केरल के सिवा कहीं भी मुस्लिमों को आरक्षण नहीं
राज्य सरकार ने कहा है, यह निश्चित रूप से माना जाता है कि केंद्रीय सूची में समग्र रूप से धर्म के आधार पर मुस्लिम समुदाय को कोई आरक्षण नहीं दिया गया है। केरल राज्य को छोड़कर, कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जो समग्र रूप से मुस्लिम समुदाय को आरक्षण प्रदान करता हो। मुस्लिम धर्म के विभिन्न समुदाय हैं जो एसईबीसी में शामिल हैं जो कर्नाटक में भी जारी है।