भारतीय राजनीति और टेस्ट क्रिकेट में तिहरा शतक बनने का कारनामा बहुत कम होता है। लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 325 सीटों पर जीत हासिल करके भाजपा ने भारतीय राजनीति में नया इतिहास लिख दिया है। पीएम मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस जीत को आजाद भारत के इतिहास की सबसे बड़ी जीत बताया। लेकिन इस जीत के बीच एक बात राजनीतिक विश्लेषकों को बहुत चुभ रही है।
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'सबका साथ सबका विकास' की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को चुनावी समर में नहीं उतारा था। इसे लेकर उसकी आलोचना हुई थी। वहीं दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी ने 94 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था।
उत्तर प्रदेश में बीजेपी को जहां 325 सीटें मिलीं वहीं बीएसपी को 19 और सपा-कांग्रेस गठबंधन को 54 सीटें हासिल हो सकीं। भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत का नतीजा यह हुआ कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में सबसे कम मुस्लिम विधायक पहुंच सके। 403 सदस्यों वाली विधानसभा में केवल 24 मुस्लिम विधायक हैं। ऐसा इससे पहले भी एक बार हो चुका है। साल 1967 में हुए चुनावों में सबसे कम 23 मुस्लिम उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे थे।
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आबादी 19 प्रतिशत प्रतिनिधित्व केवल 6 प्रतिशत
फाइल फोटो
साल 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में 69 मुस्लिम जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंचे थे। यह उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की सबसे बड़ी संख्या थी। इस बार सपा के टिकट पर 17 मुस्लिम प्रत्याशी विधायक बनने में सफल हुए हैं। जबकि 94 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने वाली बसपा के 5 मुस्लिम उम्मीदवार विधानसभा पहुंचने में सफल हुए।
तकरीबन 22 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी में हिस्सेदारी 19 प्रतिशत है। लेकिन 403 सदस्यों वाली विधान सभा में 23 उनकी हिस्सेदारी घटकर लगभग 6 प्रतिशत पर पहुंच गई है। 16 वीं विधानसभा में 69 सदस्यों के साथ यह हिस्सेदारी 16.87 प्रतिशत थी। 2017 में 19 सीट जीतने वाली बसपा के 5 विधायक मुस्लिम हैं। वहीं 54 सीट जीतने वाले सपा-कांग्रेस गठबंधन में 19 मुस्लिम हैं।। जिनमें से 17 सपा के और 2 कांग्रेस पार्टी के हैं।
मुस्लिम बहुल इलाके में भी चली मोदी लहर
नरेंद्र मोदी
- फोटो : अमर उजाला
उत्तर प्रदेश में 143 सीटें ऐसी हैं जिनके बारे में माना जाता है कि यहां मुस्लिम उम्मीदवार के लिए जीत हासिल करना आसान होता है। इनमें से 70 सीटें ऐसी हैं जिनमें तकरीबन 20 से 25 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। जबकि बाकी की 73 सीटों में मुस्लिम मतदाताओं की आबादी 30 प्रतिशत या उससे ज्यादा है।
उदाहरण के लिए बलरामपुर में 40 प्रतिशत, गोंडा में 32 प्रतिशत, फैजाबाद में 30 प्रतिशत मु्स्लिम आबादी, अलीगढ़ में 42 प्रतिशत, मुजफ्फरनगर में 49 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है लेकिन इन सभी जिलों में सभी सीटों पर भाजपा प्रत्याशी को जीत मिली। दूसरी किसी पार्टी के उम्मीदवार को जीत नहीं मिल सकी।
2017 से पहले पांच विधानसभा चुनावों में मुस्लिम विधायकों की संख्या लगातार बढ़त दर्ज की गई थी। 1993 में यह संख्या 28 थी। इसके बाद 1996 में यह 38, 2002 में 46, 2007 में 56 और 2012 में 69 बढ़कर अपने शिखर पर पहुंच गई थी।
इन चुनावों में बसपा, सपा को तगड़ा झटका लगा है। इन नतीजों को देखकर लगता है कि यूपी में क्षेत्रीय दलों के वर्चस्व का दौर अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हश्र हुआ था। भाजपा गठबंधन ने प्रदेश की 80 सीटों में से 76 में जीत हासिल की थी। वहीं सपा मजह 4 सीट जीत सकी थी। बसपा का कोई प्रत्याशी लोकसभा में नहीं पहुंच सका था। कुछ वैसा ही परिणाम विधान सभा चुनाव में भी देखने को मिला है। बीएसपी को 2012 में 80 सीटें मिलीं थीं इस बार वह 19 सीट पर सिमट गई। यह बसपा का 1991 के बाद सबसे खराब प्रदर्शन है। 1991 में उसे 12 सीटें हासिल हुई थीं।
सपा ने हाल ही में अपने गठन के 25 साल पूरे किए। लेकिन यह उनके लिए सबसे खराब साबित हुआ। गठन के बाद से यह सपा का सबसे खराब प्रदर्शन है। सपा को इन चुनावों में 47 सीटें हासिल हुई हैं। सपा का इससे पहले यूपी चुनाव में सबसे खराब प्रदर्शन साल 2007 में रहा था। तब सपा को विधानसभा में 97 सीट हासिल हुई थीं।