रामलीलाओं के मंचन को लोग भले ही मजहब से जोड़ने में जुटे हों, पर ऐसे मंचों की कमी नहीं है जो गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल हैं। वाराणसी के खरगूपुर की रामलीला भी इसी सौहार्द का प्रतीक है।
लगभग सौ साल से व्यास गद्दी से लेकर पात्र चयन तक गोराई डीहा गांव निवासी स्व. शाह मोहम्मद उर्फ शामा का परिवार शामिल होता चला आ रहा है। शाह के बाद इनके बेटे अली हसन उर्फ शोखन ने इस रामलीला के व्यास पीठ पर वाद्य यंत्र की कमान के साथ रामायण की बानी संभाली।
यहां दक्षिण मुखी प्राचीन श्री हनुमान मंदिर के प्रांगण में लगभग डेढ़ सौ वर्ष से रामलीला होता चला आ रहा है। लगभग डेढ़ माह पूर्व हसन की पत्नी नूरजंहा बेगम का बीमारी से इंतकाल हो गया उसके बाद भी इन्होंने अपने खानदानी परंपरा को टूटने नही दिया और रामलीला में शामिल होकर पात्र चयन के साथ व्यास पीठ पर वाद्य यंत्र के माध्यम से हिंदू मुस्लिम एकता का परचम लहराया।