ठीक यही सब वीरेंद्र के साथ भी हुआ। हाल ही में अपनी पत्नी और दो बच्चों को खोने वाली वीरेंद्र का कहना है कि कुछ साल पहले इसी तरह उनके 10 साल के बेटे की भी मौत हुई थी। अब जब उनका परिवार खत्म हो गया तो अधिकारियों ने उनके घर भी अनाज पहुंचाया है। इस समुदाय के लोगों की मौत भूख के कारण हो रही है।
वीरेंद्र की पत्नी का नाम तो साल 2017 से मनरेगा योजना में भी दर्ज था लेकिन उसे कोई काम नहीं मिला। वीरेंद्र का कहना है कि सरकार की ओर से मिलने वाले खाने के पैकेज और कुछ पैसे उनकी मौत को कुछ समय के लिए केवल टाल सकते हैं। अधिकारियों का कहना है कि ये मौतें भूख के कारण नहीं हुई हैं। वहीं सरकारी आंकड़ों में बताया गया है कि वीरेंद्र की पत्नी और बच्चों की मौत डायरिया के कारण हुई है।
मामले पर कुशीनगर के चीफ मेडिकल अफसर हरीचरण सिंह का कहना है कि सोनवा देवी के बेटों की मौत कार्डियोरेस्पिरेटरी फेलियर और टीबी के कारण हुई है। वह भूख के कारण नहीं मरे। अभी जांच की जा रही है कि उन्हें इलाज मिल पाया था या नहीं। वहीं इन मौतों के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी बयान आया। जिसमें उन्होंने कहा, 'हमारी सरकार मुसहर समुदाय को नौकरी, राशन कार्ड और घर दे रही है। परिवार के पास राशन कार्ड भी था।'
लेकिन मामले पर परौना ब्लॉक के टीबी अफसर राकेश कुमार का कहना है कि उन्होंने सोनवा के बेटों की जांच की थी। उन्हें टीबी की बीमारी नहीं थी। उन्होंने ये भी कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें धमकी दी है कि वह किसी को भी सच न बताएं। सोनवा का कहना है कि सरकारी डॉक्टरों ने भी जांच के बाद कहा था कि उनके बेटों को कोई बीमारी नहीं है लेकिन खाना न मिलने और देरी से इलाज के कारण उनकी मौत हो गई। सोनवा ने कहा कि उनके पास राशन कार्ड भी नहीं है केवल एक नंबर है और मनरेगा में भी उन्हें कोई काम नहीं मिला।
यहां से थोड़ी दूरी पर स्थित है सिमरो हरदो गांव। यहां रहने वाला छोटा सा अर्जुन और बाकी बच्चे स्कूल नहीं जाते। ये सभी पूरे दिन केवल चूहों की तलाश करते रहते हैं। अगर उन्हें चूहे मिल जाते हैं तो उनके रात के खाने का इंतजाम हो जाता है। अगर थोड़े ज्यादा मिल जाते हैं तो अगले दिन के नाशते का इंतजाम हो जाता है।
अर्जुन की मां ऊषा का कहना है कि चूहे और घोघें ही उन्हें जीने में मदद करते हैं। उनके समुदाय के ज्यादातर लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। उन्हें राशन की दुकान से चावल और गेहूं मिलता है। ऊषा का कहना है कि उन्हें नहीं पता होता कि उन्हें कितनी मात्रा में अनाज मिलेगाा। जो अनाज मिलता भी है वह भी कम मात्रा में ही होता है। जब भी उन्हें पैसों की या फिर दवाइयों की जरूरत होती है तो उन्हें शहर के लोगों को राशन का अनाज बेचना पड़ता है। ऊषा का कहना है कि या तो उन्हें दवाइयां मिल पाती हैं या फिर खाना। जब वह लोग बीमार पड़ जाते हैं तो उनकी मौत हो जाती है।