सोमनाथ चटर्जी हमारे बीच नहीं रहे। वह एक प्रखर सांसद थे। हालांकि उनकी राजनीतिक विचारधारा से हमारा मेल नहीं था, लेकिन कह सकता हूं कि उनके जैसा संसदीय परंपरा और अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने वाला लोकसभा अध्यक्ष मिलना मुश्किल है। उन्होंने इस पद पर रहकर एक आदर्श कायम किया है। यह आदर्श आगे की पीढिय़ों के लिए अनुकरणीय है।
लोकसभा अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने अपनी पार्टी माकपा की लाइन का ख्याल नहीं रखा। लोकसभा अध्यक्ष के कर्तव्य का निर्वहन किया। यह कोई छोटी बात नहीं है। उन्होंने इसके लिए अपने पार्टी की नाराजगी की भी परवाह नहीं की। इसका उन्हें फल भुगतना पड़ा। उनके राजनीतिक दल माकपा ने आखिरी समय में उन्हें निलंबित कर दिया, लेकिन सोमनाथ चटर्जी चट्टान की तरह संसदीय परंपरा में विश्वास को मजबूती देने के लिए अडिग रहे। निष्पक्षता बनाए रखी। उनके कामकाज पर कभी विपक्ष भी अंगुली नहीं उठा सका। वह सहृदय थे। मिलनसार थे। अपनी बात बेबाकी से रखते थे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह विपक्ष में सांसद के तौर पर हम पर हमला नहीं बोलते थे। वहां उनका रूख एक पार्टी के प्रखर सांसद जैसा रहता था।
एक बात और। सोमनाथ दा उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल और भाजपा के नेता स्व.विष्णुकांत शास्त्री जी के सहपाठी थे। विष्णुकांत जी से उनकी मुलाकात होती थी। वह उनके पास गए भी थे। विष्णुकांत जी ने उनकी बातों को ध्यान से सुना। यह बात अलग है कि सुनकर ही रह गए। माना नहीं। आप राजनीति और व्यवहार में आज सोमनाथ जी जैसा व्यक्ति, मिक्स अप करने में समर्थ व्यक्तित्व आसानी से नहीं पा सकते।