मुंबई के लिए पुल हादसे की खबरें नई नहीं हैं। यहां के ज्यादातर फुटओवर ब्रिज पुराने और जर्जर होने के बावजूद हर रोज लोगों का जितना वजन उठाते हैं, उसमें ऐसे हादसे ताज्जुब नहीं पैदा करते। मीडिया के लिए या खबरिया चैनलों के लिए बेशक ऐसी दुखद खबरें ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनती हैं और हादसों के बाद तमाम एंगल से रिपोर्ट दिखाई जाती है, लेकिन न तो सरकार पर इसका असर दिखता है, न ही स्थानीय प्रशासन पर। हादसा हो जाने के बाद मुआवजे की बातें, पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना के दो शब्द और भविष्य में ऐसे हादसे रोकने की कागजी योजनाओं के अलावा कुछ नहीं होता।
कुछ पुराने हादसे याद कीजिए। पिछले साल जुलाई में अंधेरी के गोखले ब्रिज और उससे पहले एलफिंस्टन रोड ओवरब्रिज हादसों के बाद क्या हुआ था। एलफिंस्टन रोड हादसे में 22 लोगों की मौत हो गई थी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 5-5 लाख के मुआवजे का एलान किया था। इन हादसों में कई लोग जख्मी हुए। हादसे पर सियासत हुई, मुआवजे का एलान हुआ, जर्जर पुलों का सर्वे किया गया और फिर सरकार अपने सियासी खेल में उलझ गई।
दरअसल ये आम धारणा है कि मुंबई में बारिश के मौसम में ही ऐसे हादसे होते हैं। इसलिए वहां बारिश से पहले पुरानी इमारतों को मोटे नीले प्लास्टिक से ढका जाता है, बीएमसी कहने को कई एहतियाती कदम भी उठाता है, लेकिन पुराने पुलों को लेकर योजनाएं कागजों से बाहर नहीं निकलतीं। अंधेरी के गोखले ब्रिज हादसे के बाद कहा गया कि मुंबई के करीब 445 ओवरब्रिज का निरीक्षण किया जा रहा है। यह भी कहा गया कि इनमें से 6 ओवरब्रिज को बंद करके फिर से बनाया जाएगा। ये ओवरब्रिज थे – मलाड फुटओवर ब्रिज, तिलकनगर फुटओवर ब्रिज, गोखले ब्रिज, घाटकोपर, कलानगर और वसई ओवरब्रिज। लेकिन इन तमाम पुलों में छत्रपति शिवाजी टर्मिनल यानी सीएसटी का नाम नहीं था।
दरअसल मीडिया के लिए सीएसटी का यह पुल महज इसलिए खास हो गया क्योंकि यहां से अजमल कसाब जैसा आतंकी गोलियां बरसाता हुआ गुजरा था। तमाम चैनल के रिपोर्टर हादसे का ब्यौरा बताने से ज्यादा बार बार पुल के ऐतिहासिक महत्व के नाम पर इसे अजमल कसाब से जोड़कर पेश कर रहे थे। इसे हम क्या कहें कि क्या कोई पुल इसलिए मशहूर हो सकता है कि उसपर से कसाब जैसा आतंकी गुजरा, या फिर देश के कई जाने माने लोग गुजरे? तमाम पुलों पर रोज हजारों लाखों लोग गुजरते हैं – आम भी, खास भी, गुंडे भी, मवाली भी, स्टार भी, नेता भी... लेकिन अफसोस कि इस बात पर कम जोर होता है कि पुल आखिर इतने जर्जर क्यों हैं, लोगों की जान इतनी सस्ती क्यों है, इसके लिए बीएमसी या सरकार क्या कर रही है, हर बार हादसे का इंतजार क्यों होता है, नेता, मंत्री, संतरी सब आते हैं, सियासी बोल बोलते हैं, अफसोस जताते हैं, जांच का भरोसा दिलाते हैं और कुछ ही दिनों में मामला किस ठंडे बस्ते में जाता है, पता नहीं चलता।
वैसे मुंबई में बारिश अब कुछ ही दिनों बाद शुरू होने वाली है और फिलहाल स्थानीय प्रशासन के पास अब तक इस बार भी इससे बचने की कोई ठोस योजना नहीं है। मुंबई की जर्जर इमारतों या पुलों को लेकर अब तक कोई जमीनी कार्रवाई नजर नहीं आ रही है। चुनाव का वक्त है और सभी सियासी पार्टियां अपने अपने वोट बैंक बचाने-बढ़ाने के रास्ते तलाश रही हैं। जाहिर है सीएसटी ओवरब्रिज हादसा भी इसी की भेंट चढ़ जाएगा। आखिर मुंबई को और कितने हादसों का इंतजार है?