मुंबई के सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक गणेश उत्सव का इंतजार कर रहे करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए बेहद पावन घड़ी आ गई है। गणेश चतुर्थी के महापर्व से ठीक पहले शुक्रवार शाम को मुंबई के प्रतिष्ठित 'लालबागचा राजा' की पहली भव्य झलक का अनावरण कर दिया गया है। लालबागचा राजा केवल एक मूर्ति भर नहीं है, बल्कि यह मुंबई की सामूहिक आस्था, अनुपम कलात्मक महारत और जीवंत सांस्कृतिक भावना का सबसे बड़ा प्रतीक है। हर साल लाखों-करोड़ों श्रद्धालु बप्पा के दर्शन पाने के लिए लालबाग के पंडाल में उमड़ते हैं। पहली झलक का यह अनावरण मुंबई में गणेशोत्सव के आधिकारिक उत्साह और बप्पा के स्वागत की शुरुआत का प्रतीक बन चुका है।
सिंहासन पर विराजमान बप्पा का पहला रूप कैसा है?
शुक्रवार शाम को जैसे ही लालबागचा राजा के मुख से पर्दा हटा, वहां मौजूद भक्त भाव-विभोर हो गए। इस बार भी भगवान गणेश की राजसी और विशाल प्रतिमा को एक भव्य सिंहासन पर विराजमान दिखाया गया है। यह दिव्य प्रतिमा अपने भक्तों को शांत, परम दयालु और अत्यंत प्रेमपूर्ण स्वरूप में आशीर्वाद देती नजर आ रही है। बेजोड़ शिल्पकला से गढ़ी गई यह मूर्ति हर साल की तरह इस बार भी पूरे उत्सव का सबसे प्रमुख आकर्षण बनी हुई है। साल 2026 में गणेश चतुर्थी का पावन पर्व 14 सितंबर से शुरू होने जा रहा है। हर वर्ष मुंबई के गणेशोत्सव से पहले लालबागचा राजा की पहली झलक देखना पूरे देश के श्रद्धालुओं के लिए सबसे प्रतीक्षित पलों में से एक होता है।
क्या है लालबागचा राजा मंडल का गौरवशाली इतिहास?
लालबागचा राजा गणपति की इस विश्वविख्यात मूर्ति का संबंध 'लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल' से है, जो पुतलाबाई चॉल में स्थित है। इस पावन पूजा स्थल की स्थापना साल 1934 में की गई थी। स्थापना के बाद से ही यह मंडल मुंबई के गणेश चतुर्थी समारोहों का एक अभिन्न और अटूट हिस्सा बन चुका है। लालबागचा राजा की इस ऐतिहासिक गणपति प्रतिमा की सेवा और देखरेख का कार्य कांबली परिवार द्वारा पिछली आठ दशकों से भी अधिक समय से निरंतर किया जा रहा है। कांबली परिवार की यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी सेवा इस प्रसिद्ध मंडल से जुड़ी एक बहुत पुरानी और प्रतिष्ठित परंपरा बन चुकी है।
क्या है गणेश चतुर्थी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व?
गणेश चतुर्थी दस दिनों तक चलने वाला एक अत्यंत पावन और भव्य त्योहार है। यह हिंदू चंद्र-सौर कैलेंडर के भाद्रपद महीने के चौथे दिन से शुरू होता है। यह पर्व चतुर्थी तिथि से प्रारंभ होकर अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। इस पूरे उत्सव काल को विनायक चतुर्थी या विनायक चविथी के नाम से भी जाना जाता है। यह पावन त्योहार भगवान गणेश को 'नई शुरुआत के देवता', 'विघ्नहर्ता' यानी बाधाओं को दूर करने वाले तथा ज्ञान और बुद्धिमत्ता के देवता के रूप में पूजने का अवसर है। मुंबई और पूरे महाराष्ट्र में शिंदे महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री हैं और पूरे राज्य में यह उत्सव भारी उत्साह, श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है, जहां लाखों श्रद्धालु बप्पा का आशीर्वाद लेने विभिन्न पंडालों में पहुंचते हैं।
पर्यावरण अनुकूल मूर्तियों और उत्सव की परंपराओं में क्या बदलाव आ रहे हैं?
दस दिनों के इस पावन उत्सव के दौरान श्रद्धालु भगवान गणेश की सुंदर मूर्तियों को अपने घरों में लाते हैं, पूरी निष्ठा से व्रत रखते हैं, पारंपरिक पकवान तैयार करते हैं और पूजा-अर्चना के लिए बड़े-बड़े पंडालों का दौरा करते हैं। इस बार इस भव्य आयोजन के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों पर भी समाज का ध्यान तेजी से बढ़ रहा है। पिछले एक दशक से मुंबई के एक स्थानीय कारीगर पारंपरिक मिट्टी या प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) के बजाय इको-पेपर यानी पर्यावरण-अनुकूल कागज से गणपति की मूर्तियां बनाकर इस उत्सव को मनाने के तरीके में चुपचाप एक बड़ी क्रांति ला रहे हैं। यह पहल श्रद्धा के साथ प्रकृति की रक्षा का सुंदर संदेश दे रही है।