आखिरकार एसीपी इसाक इब्राहिम बागवां थे जिन्होंने लियोपोल्ड कैफे से कोलाबा बाजार जाने का फैसला लिया जहां जबरदस्त धमाके की आवाजें आई थीं। निर्माण हाउस पहुंचने में उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा क्योंकि वहां के स्थानीय लोग भी उस जगह के बारे में बहुत अच्छे से नहीं जानते थे। जब इसाक वहां पहुंचे तब उन्हें पता चल पाया कि वहां कुछ यहीदी आतंकियों के कब्जे में हैं। तब उन्होंने मदद के लिए और अधिकारियों को बुलाया और आस-पास रह रहे लोगों को जगह खाली करने को कहा।
पुलिस वाले बगल की इमारतों से निर्माण हाउस में मौजूद आतंकियों पर गालियां चलानी शुरू कीं। 27 की सुबह मोशे जो आतंकियों के कब्जे में था अपनी नैनी सांद्रा सैमुयल्स के साथ बाहर आया। 27 की दोपहर जबतक एनएसजी ने पूरा ऑपरेशन अपने कब्जे में नहीं ले लिया तब तक मुंबई पुलिस और आतंकियों के बीच गोलीबारी चलती रही। इस हमले में रब्बी गैवरिल और उसकी पत्नी रेविका के साथ पांच यहूदी इस हमले में मारे गए।
यह बात चौंकाती है कि 26\11 हमले से पहले यहूदियों को निशाना साधे जाने की सूचना तीन बार मुंबई पुलिस को दी गई थी। तब भी निर्माण हाउस को भी टार्गेट नहीं बनाया जा सकता है यह पुलिस नहीं सोच सकी। समिति के राम प्रधान का कहना है कि यह पूरे मामले को आर अच्छे से हैंडल किया जा सकता था लेकिन यहूदियों की बस्ती के बारे में न तो कोलाबा पुलिस को और न ही स्पेशल ब्रांच को ही निर्माण हाउस के बारे में जानकारी थी। 26 नवंबर के मुंबई हमले के बाद ही सरकार को इज्रायली अथॉरिटी से देशभर में ज्वीश सेंटर की जानकारी मिली जहां आज सुरक्षा के चाक चौबंद इंतजाम हैं।