मुकुल रॉय ममता बनर्जी के उतने ही खास थे जितना कि कभी सुवेंदु अधिकारी हुआ करते थे। लोगों के जेहन में अभी भी वह तस्वीर धुंधली नहीं पड़ी है जब यूपीए सरकार में दिनेश त्रिवेदी से नाराज ममता बनर्जी ने उनसे रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दिलवा दिया था, और उनकी जगह मुकुल रॉय को रेल मंत्री बनवा दिया था। शायद भारत के इतिहास में यह पहली घटना रही होगी जहां रेल मंत्रालय का बजट किसी एक मंत्री (दिनेश त्रिवेदी) ने पेश किया था, तो उसे पास दूसरे रेल मंत्री मुकुल रॉय ने कराया था।
कहा जाता है कि ममता बनर्जी के संघर्ष को आगे बढ़ाने में मुकुल रॉय का एक बड़ा हाथ था। मुकुल रॉय जैसे चंद नेताओं के साथ की ही बदौलत ममता बनर्जी अपना मिशन आगे बढ़ा पाईं और कुछ ही सालों में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गईं। यही कारण है कि मुकुल रॉय की भाजपा ज्वाइन करने की 'बड़ी गलती' को भी भूलते हुए उनका पार्टी में वापसी का रास्ता तैयार कर लिया गया।
दरअसल, ममता बनर्जी अपने इस पुराने सिपाहसालार की क्षमता से बखूबी वाकिफ हैं। वे जानती हैं कि बहुत कम बोलने वाले मुकुल रॉय चुपचाप अपना काम करना जानते हैं और दिन-रात अपने उद्देश्यों के लिए लगे रहते हैं। अब वे मुकुल रॉय की इसी खूबी को दुबारा इस्तेमाल करना चाहती हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस मुकुल रॉय को राज्यसभा में भेजने का मन बना चुकी है। वे यहां रहकर 2024 के आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए काम करेंगे। उनकी कोशिश यह भी होगी कि अगर गैर-भाजपाई दलों के बीच नेतृत्व के मुद्दे पर कोई सहमती बन सके तो ममता बनर्जी को उस खेमे के नेतृत्व के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जाए।
2024 के आम चुनाव के पहले ममता बनर्जी जिस तरह से फाइटर बनकर उभरी हैं, किसान नेता राकेश टिकैत जैसे नेताओं ने उनसे मिलकर जिस तरह विरोध की कमान अपने हाथ में लेने की अपील की है। जिस तरह ममता बनर्जी के इस विधान सभा चुनाव में चाणक्य की भूमिका निभा चुके प्रशांत किशोर, शरद पवार जैसे नेता से मिलकर 2024 की पटकथा लिखना शुरू कर चुके हैं, उसे देखकर लगता है कि ममता बनर्जी को अपने इस पुराने विश्वस्त से बड़ी उम्मीदें हैं। ममता का यह विश्वास कितना खरा उतरेगा यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है।