महात्मा गांधी से एक मुलाकात ने बदल दी जीवन की दिशा
बात 1916 की हो रही थी, जब श्रीकृष्ण सिन्हा पहली बार महात्मा गांधी से मिले। इस मुलाकात ने उन्हें इतना प्रेरित किया कि श्रीकृष्णा सिन्हा आजादी की लड़ाई में कूद गए। आजादी की इस लड़ाई के लिए उन्होंने 1921 में वकालत का पेशा भी छोड़ दिया। 1922 में उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा। दलअसल, ये वो साल था जब अंग्रेज़ों ने कांग्रेस सेवा दल को एक अवैध पार्टी करार दिया। कृष्ण सिन्हा इस पार्टी के सदस्य थे और इसी कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। नमक सत्याग्रह के दौरान भी उन्हें जेल में डाल गया। आजादी की लड़ाई के दौरान श्रीकृष्ण सिन्हा ने लगभग आठ साल जेल में बिताए।
मुख्यमंत्री के रूप में श्रीकृष्ण सिन्हा के ये काम आज भी किए जाते हैं याद
1937 में, जब अंग्रेजों ने धीरे-धीरे राज्यों की सत्ता में भारतीयों को जगह देना शुरू किया तो बिहार में कांग्रेस सत्ता में आई। श्रीकृष्ण सिन्हा इस प्रांत के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 20 जुलाई 1937 को पटना में, भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत, अपने कैबिनेट का गठन किया। कृष्ण सिन्हा ने 1937 से 1961 तक बिहार की बागडोर संभाली। जमींदारी प्रथा को समाप्त करने वाले वे देश के पहले मुख्यमंत्री थे। उन्होंने कोशी, अघौर और सकरी में नदी-घाटी परियोजनाओं को भी लागू किया और बिहार में तेल-शोधन और उर्वरक उत्पादन जैसे भारी उद्योगों की भी शुरुआत की।
1957 में अपने ही साथी ने दे चुनौती, जीत के बाद दोनों रोए
श्रीकृष्ण सिन्हा की कहानी में एक अहम पड़ाव है 1957 का चुनाव। दरअसल, कांग्रेस ने यह चुनाव श्रीकृष्ण सिन्हा के नेतृत्व में ही लड़ा था। बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस ने 318 में से 210 सीटें जरूर हासिल कर लीं, लेकिन जातीय स्तर की राजनीति अंदर ही अंदर कांग्रेस में घर कर चुकी थी। ऐसे में श्रीकृष्ण सिन्हा के फिर मुख्यमंत्री बनने के रास्ते में अवरोध लग गए। फैसला हुआ कि अगले मुख्यमंत्री का फैसला विधायक दल करेगा। श्रीकृष्ण सिन्हा को चुनौती मिली अपने ही एक करीबी नेता अनुग्रह नारायण सिंह से। मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए यह जंग इसलिए भी दिलचस्प थी, क्योंकि श्रीकृष्ण सिन्हा भूमिहार थे और अनुग्रह नारायण राजपूत। खैर विधायक दल की बैठक हुई और श्रीकृष्ण सिन्हा को नेता चुन लिया गया।
बिहार में श्रीकृष्ण सिन्हा का घर
इस घटना के बाद सिन्हा के समर्थकों ने उन्हें गाजे-बाजे के साथ घर तक पहुंचाया। इस हुजूम से अनुग्रह नारायण का खेमा गायब रहा। हालांकि, कुछ देर बाद जब श्रीकृष्ण सिन्हा अपने घर पहुंचकर जश्न से जुड़े, उसी दौरान एक तेज रफ्तार गाड़ी भी उनके घर के दरवाजे पर आकर रुकी। सिन्हा खुद घर से बाहर आकर इस गाड़ी को रिसीव करने पहुंचे। गाड़ी में सवार थे खुद अनुग्रह नारायण सिंह। जब वे गाड़ी से उतरे तो माहौल भावुक हो गया। अनुग्रह ने श्रीकृष्ण को चुनौती देने पर उनसे माफी मांगी और गले लगकर रोने लगे। इस पर सीएम के भी आंसू छलक आए।
सुरक्षाकर्मियों को छोड़ देते थे बाहर
बिहार के बुजुर्ग लोग बताते हैं कि श्री बाबू जब सीएम थे तो कई बार अपने गांव भी जाते थे। उस वक्त वह अपने सुरक्षाकर्मियों को गांव के बाहर ही छोड़ देते थे। वह कहते थे कि यह मेरा गांव है। यहां मुझे कोई खतरा नहीं।
मोरारजी देसाई के साथ श्रीकृष्ण सिन्हा।